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Rigveda Mandal 5 / Sukta 44 / Mantra 6

87 Sukta
15 Mantra
5/44/6
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अवत्सारः काश्यप अन्ये च दृष्टलिङ्गाः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
या॒दृगे॒व ददृ॑शे ता॒दृगु॑च्यते॒ सं छा॒यया॑ दधिरे सि॒ध्रया॒प्स्वा। म॒हीम॒स्मभ्य॑मुरु॒षामु॒रु ज्रयो॑ बृ॒हत्सु॒वीर॒मन॑पच्युतं॒ सहः॑ ॥६॥

या॒दृक् । ए॒व । ददृ॑शे । ता॒दृक् । उ॒च्य॒ते॒ । सम् । छा॒यया॑ । द॒धि॒रे॒ । सि॒ध्रया॑ । अ॒प्ऽसु । आ । म॒हीम् । अ॒स्मभ्य॑म् । उ॒रु॒ऽसाम् । उ॒रु । ज्रयः॑ । बृ॒हत् । सु॒ऽवीर॑म् । अन॑पऽच्युतम् । सहः॑ ॥

Mantra without Swara
यादृगेव ददृशे तादृगुच्यते सं छायया दधिरे सिध्रयाप्स्वा। महीमस्मभ्यमुरुषामुरु ज्रयो बृहत्सुवीरमनपच्युतं सहः ॥

यादृक्। एव। ददृशे। तादृक्। उच्यते। सम्। छायया। दधिरे। सिध्रया। अपऽसु। आ। महीम्। अस्मभ्यम्। उरुऽसाम्। उरु। ज्रयः। बृहत्। सुऽवीरम्। अनपऽच्युतम्। सहः ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 24 Mantra » 1

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Meaning
जो (ज्रयः) वेगवाले (सिध्रया) मङ्गलस्वरूप (छायया) छाया से (अप्सु) जलों वा प्राणों में (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (उरुषाम्) बहुतों के विभाग करनेवाले को (महीम्) बड़ी वाणी और (उरु) बहुत (बृहत्) बड़े (सुवीरम्) सुन्दर वीर पुरुष जिससे उस (अनपच्युतम्) नाश से रहित (सहः) बल को (सम्, आ, दधिरे) उत्तम प्रकार धारण करते हैं और जिन लोगों से (यादृक्) जैसा (ददृशे) देखा जाता है (तादृक्) वैसा (एव) ही (उच्यते) कहा जाता है, वे हम लोगों से निरन्तर सत्कार करने योग्य हैं ॥६॥
Essence
जो अन्य जनों में विद्या के बल और धन के संचय को स्थापित करते हैं और जिनसे जैसा आत्मा में वर्त्तमान है, वैसा मन में और जैसा मन में वैसा वाणी से कहा जाता है, वे ही यथार्थवक्ता जानने योग्य हैं ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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