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Rigveda Mandal 5 / Sukta 44 / Mantra 4

87 Sukta
15 Mantra
5/44/4
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अवत्सारः काश्यप अन्ये च दृष्टलिङ्गाः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
प्र व॑ ए॒ते सु॒युजो॒ याम॑न्नि॒ष्टये॒ नीची॑र॒मुष्मै॑ य॒म्य॑ ऋता॒वृधः॑। सु॒यन्तु॑भिः सर्वशा॒सैर॒भीशु॑भिः॒ क्रिवि॒र्नामा॑नि प्रव॒णे मु॑षायति ॥४॥

प्र । वः॒ । ए॒ते । सु॒ऽयुजः॑ । याम॑न् । इ॒ष्टये॑ । नीचीः॑ । अ॒मुष्मै॑ । य॒म्यः॑ । ऋ॒त॒ऽवृधः॑ । सु॒यन्तु॑ऽभिः । स॒र्व॒ऽशा॒सैः । अ॒भीशु॑ऽभिः । क्रिविः॑ । नामा॑नि । प्र॒व॒णे । मु॒षा॒य॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
प्र व एते सुयुजो यामन्निष्टये नीचीरमुष्मै यम्य ऋतावृधः। सुयन्तुभिः सर्वशासैरभीशुभिः क्रिविर्नामानि प्रवणे मुषायति ॥

प्र। वः। एते। सुऽयुजः। यामन्। इष्टये। नीचीः। अमुष्मै। यम्यः। ऋतऽवृधः। सुयन्तुऽभिः। सर्वऽशासैः। अभीशुऽभिः। क्रिविः। नामानि। प्रवणे। मुषायति ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 23 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (क्रिविः) प्रजा का पालन करनेवाला सूर्य्य (अभीशुभिः) किरणों से (प्रवणे) नीचे स्थल में (नामानि) जलों को (प्र, मुषायति) अत्यन्त चुराता है, वैसे ही हे मनुष्यो ! जो (सुयुजः) अच्छे धर्म से युक्त होते वे (एते) राजा आदि जन (वः) आप लोगों के (इष्टये) इष्ट सुख के लिये (यामन्) मार्ग में और (अमुष्मै) परोक्ष सुख के लिये (सुयन्तुभिः) उत्तम नियन्ता जिनमें उन (सर्वशासैः) सम्पूर्ण राज्य के शासन करनेवालों से (यम्यः) न्यायकारी के लिये हितकारक (ऋतावृधः) सत्य को बढ़ानेवाली (नीचीः) नीची हुई प्रजाओं को सम्पन्न करें ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य्य सब के सुख के लिये जल को खींचता है, वैसे ही राजा न्यायमार्ग से सम्पूर्ण प्रजाओं को चलाता हुआ उत्तम विज्ञान से युक्त भृत्यों के सहित सब मनुष्यों के हित का सम्पादन करता है ॥४॥
Subject
अब सूर्य्यसंयोग से मेघदृष्टान्त से राजगुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥