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Rigveda Mandal 5 / Sukta 44 / Mantra 3

87 Sukta
15 Mantra
5/44/3
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अवत्सारः काश्यप अन्ये च दृष्टलिङ्गाः Chhanda- विराट्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अत्यं॑ ह॒विः स॑चते॒ सच्च॒ धातु॒ चारि॑ष्टगातुः॒ स होता॑ सहो॒भरिः॑। प्र॒सर्स्रा॑णो॒ अनु॑ ब॒र्हिर्वृषा॒ शिशु॒र्मध्ये॒ युवा॒जरो॑ वि॒स्रुहा॑ हि॒तः ॥३॥

अत्य॑म् । ह॒विः । स॒च॒ते॒ । सत् । च॒ । धातु॑ । च॒ । अरि॑ष्टऽगातुः । सः । होता॑ । स॒हः॒ऽभरिः॑ । प्र॒ऽसर्स्रा॑णः । अनु॑ । ब॒र्हिः । वृषा॑ । शिशुः॑ । मध्ये॑ । युवा॑ । अ॒जरः॑ । वि॒ऽस्रुहा॑ । हि॒तः ॥

Mantra without Swara
अत्यं हविः सचते सच्च धातु चारिष्टगातुः स होता सहोभरिः। प्रसर्स्राणो अनु बर्हिर्वृषा शिशुर्मध्ये युवाजरो विस्रुहा हितः ॥

अत्यम्। हविः। सचते। सत्। च। धातु। च। अरिष्टऽगातुः। सः। होता। सहःऽभरिः। प्रऽसर्स्राणः। अनु। बर्हिः। वृषा। शिशुः। मध्ये। युवा। अजरः। विऽस्रुहा। हितः ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 23 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (अरिष्टगातुः) ऐसा है कि जिसकी नहीं हिंसित वाणी वह (सहोभरिः) बल को धारण करनेवाला (होता) दाताजन (प्रसर्स्राणः) प्रकर्षता से अत्यन्त चलता हुआ (वृषा) बलिष्ठ (युवा) यौवन अवस्था को प्राप्त (अजरः) वृद्ध अवस्था से रहित (विस्रुहा) रोगों का नाश करनेवाला (हितः) हितकारी (बर्हिः) अन्तरिक्ष को (अनु) पश्चात् (सत्) वर्त्तमान को (च) और (धातु) धारण करनेवाले (च) और (अत्यम्) व्याप्त होनेवाले में उत्पन्न (हविः) हवन करने योग्य द्रव्य को (सचते) सम्बन्धित करता है (सः) वह (शिशुः) बालक माता को जैसे वैसे संसार के (मध्ये) बीच में पुण्य से युक्त होता है ॥३॥
Essence
हे राजन् ! जैसे हवन करनेवाला सुगन्धि आदि से युक्त, अग्नि में हवन किये हुए द्रव्य से वायु, वृष्टि और जल की शुद्धि के द्वारा संसार में सुख का उपकार करता है, वैसे न्याय और कीर्ति की वासना से युक्त दी हुई विद्या से राज्य देश को सुखी करिये ॥३॥
Subject
अब मेघविषय से राजगुणों को कहते हैं ॥