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Rigveda Mandal 5 / Sukta 44 / Mantra 2

87 Sukta
15 Mantra
5/44/2
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
श्रि॒ये सु॒दृशी॒रुप॑रस्य॒ याः स्व॑र्वि॒रोच॑मानः क॒कुभा॑मचो॒दते॑। सु॒गो॒पा अ॑सि॒ न दभा॑य सुक्रतो प॒रो मा॒याभि॑र्ऋ॒त आ॑स॒ नाम॑ ते ॥२॥

श्रि॒ये । सु॒ऽदृशीः॑ । उप॑रस्य । याः । स्वः॑ । वि॒ऽरोच॑मानः । क॒कुभा॑म् । अ॒चो॒दते॑ । सु॒ऽगो॒पाः । अ॒सि॒ । न । दभा॑य । सु॒क्र॒तो॒ इति॑ सुऽक्रतो । प॒रः । मा॒याभिः॑ । ऋ॒ते । आ॒स॒ । नाम॑ । ते॒ ॥

Mantra without Swara
श्रिये सुदृशीरुपरस्य याः स्वर्विरोचमानः ककुभामचोदते। सुगोपा असि न दभाय सुक्रतो परो मायाभिर्ऋत आस नाम ते ॥

श्रिये। सुऽदृशीः। उपरस्य। याः। स्वः। विऽरोचमानः। ककुभाम्। अचोदते। सुऽगोपाः। असि। न। दभाय। सुक्रतो इति सुऽक्रतो। परः। मायाभिः। ऋते। आस। नाम। ते ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 23 Mantra » 2

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Meaning
हे (सुक्रतो) उत्तम कर्म्म और बुद्धि से युक्त विद्वान् ! आप जैसे (विरोचमानः) प्रकाशमान (स्वः) सूर्य्य (ककुभाम्) दिशाओं और (उपरस्य) मेघ का प्रकाशमान =प्रकाशक (आस) वर्त्तमान है, वैसे (श्रिये) धन वा शोभा के लिये (याः) जिन (सुदृशीः) दर्शनवालियों को प्रेरणा करनेवाले और (परः) उत्तम से उत्तम (सुगोपाः) उत्तम प्रकार रक्षा करनेवाले (असि) हो और (अचोदते) नहीं प्रेरणा करने और (दभाय) हिंसा करनेवाले जन के लिये (मायाभिः) बुद्धियों के साथ (न) नहीं वर्त्तमान हो जिन (ते) आपके (ऋते) सत्य में (नाम) नाम वर्त्तमान है, उसकी वे प्रजायें सब प्रकार वृद्धि को प्राप्त होती हैं ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जैसे सूर्य्य दिशाओं का प्रकाशक हुआ सब प्रजाओं को सुख देने के लिये वृष्टि करनेवाला होता है, वैसे ही सब प्रजाओं को न्याय से प्रकाशित करके विद्या और सुख का बढ़ानेवाला राजा होता है ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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