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Rigveda Mandal 5 / Sukta 44 / Mantra 15

87 Sukta
15 Mantra
5/44/15
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अवत्सारः काश्यप अन्ये च दृष्टलिङ्गाः Chhanda- विराट्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒ग्निर्जा॑गार॒ तमृचः॑ कामयन्ते॒ऽग्निर्जा॑गार॒ तमु॒ सामा॑नि यन्ति। अ॒ग्निर्जा॑गार॒ तम॒यं सोम॑ आह॒ तवा॒हम॑स्मि स॒ख्ये न्यो॑काः ॥१५॥

अ॒ग्निः । जा॒गा॒र॒ । तम् । ऋचः॑ । का॒म॒य॒न्ते॒ । अ॒ग्निः । जा॒गा॒र॒ । तम् । ऊँ॒ इति॑ । सामा॑नि । य॒न्ति॒ । अ॒ग्निः । जा॒गा॒र॒ । तम् । अ॒यम् । सोमः॑ । आ॒ह॒ । तव॑ । अ॒हम् । अ॒स्मि॒ । स॒ख्ये । निऽओ॑काः ॥

Mantra without Swara
अग्निर्जागार तमृचः कामयन्तेऽग्निर्जागार तमु सामानि यन्ति। अग्निर्जागार तमयं सोम आह तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः ॥

अग्निः। जागार। तम्। ऋचः। कामयन्ते। अग्निः। जागार। तम्। ऊँ इति। सामानि। यन्ति। अग्निः। जागार। तम्। अयम्। सोमः। आह। तव। अहम्। अस्मि। सख्ये। निऽओकाः ॥१५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 25 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (अग्निः) अग्नि के सदृश (जागार) जागृत होता है (तम्) उसकी (ऋचः) प्रशंसित बुद्धिवाले विद्यार्थी जन (कामयन्ते) कामना करते हैं, और जो (अग्निः) अग्नि के सदृश वर्त्तमान (जागार) जागृत होता है (तम्) उसको (उ) भी (सामानि) सामवेद में कहे हुए विज्ञान (यन्ति) प्राप्त होते हैं (अग्निः) के सदृश वर्तमान (जागार) जागृत होता है (तम्) उसको (अयम्) यह (न्योकाः) निश्चित स्थान युक्त (सोमः) विद्या और ऐश्वर्य्य की इच्छा करनेवाला (तव) आपकी (सख्ये) मित्रता में (अहम्) मैं (अस्मि) हूँ ऐसा (आह) कहता है ॥१५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो मनुष्य आलस्य से रहित पुरुषार्थी धार्मिक होते और जितेन्द्रिय विद्यार्थी होते हैं, उन्हीं को विद्या और उत्तम शिक्षा प्राप्त होती है ॥१५॥ इस सूक्त में सूर्य मेघ और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह चवालीसवाँ सूक्त, तीसरा अनुवाक और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
जो सत्य की कामना करते हैं, वे सत्य को प्राप्त होते हैं ॥