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Rigveda Mandal 5 / Sukta 44 / Mantra 13

87 Sukta
15 Mantra
5/44/13
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अवत्सारः काश्यप अन्ये च दृष्टलिङ्गाः Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सु॒तं॒भ॒रो यज॑मानस्य॒ सत्प॑ति॒र्विश्वा॑सा॒मूधः॒ स धि॒यामु॒दञ्च॑नः। भर॑द्धे॒नू रस॑विच्छिश्रिये॒ पयो॑ऽनुब्रुवा॒णो अध्ये॑ति॒ न स्व॒पन् ॥१३॥

सु॒त॒म्ऽभ॒रः । यज॑मानस्य । सत्ऽप॑तिः । विश्वा॑साम् । ऊधः॑ । सः । धि॒याम् । उ॒त्ऽअञ्च॑नः । भर॑त् । धे॒नुः । रस॑ऽवत् । शि॒श्रि॒ये॒ । पयः॑ । अ॒नु॒ऽब्रु॒वा॒णः । अधि॑ । ए॒ति॒ । न । स्व॒पन् ॥

Mantra without Swara
सुतंभरो यजमानस्य सत्पतिर्विश्वासामूधः स धियामुदञ्चनः। भरद्धेनू रसविच्छिश्रिये पयोऽनुब्रुवाणो अध्येति न स्वपन् ॥

सुतम्ऽभरः। यजमानस्य। सत्ऽपतिः। विश्वासाम्। ऊधः। सः। धियाम्। उत्ऽअञ्चनः। भरत्। धेनुः। रसऽवत्। शिश्रिये। पयः। अनुऽब्रुवाणः। अधि। एति। न। स्वपन् ॥१३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 25 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो विद्वान् (यजमानस्य) सत्कार करनेवाला (सुतम्भरः) उत्पन्न जगत् को धारण करनेवाला (विश्वासाम्) सम्पूर्ण (धियाम्) प्रज्ञान और कर्म्मों का (उदञ्चनः) उत्कृष्टता को प्राप्त कराने और (ऊधः) ऊपर को पहुँचाने और (सत्पतिः) सत्पुरुषों का पालन करनेवाला (रसवत्) बहुत रस से युक्त (पयः) दुग्ध को जैसे (धेनुः) गौ वैसे विद्या को (भरत्) धारण करता और धर्म्म का (शिश्रिये) आश्रयण करता और (न)(स्वपन्) शयन करता हुआ अन्यों के प्रति (अनु, ब्रुवाणः) पढ़कर पीछे उपदेश देता हुआ सत्य का (अधि, एति) स्मरण करता है (सः) वही सत्कार करने योग्य है ॥१३॥
Essence
वही उत्तम पुरुष है, जो कृतज्ञ और यथार्थवक्ता जनों की सेवा में प्रिय, सम्पूर्ण मनुष्यों के लिये बुद्धि देने और गो के सदृश सत्य उपदेश का वर्षानेवाला और अविद्या आदि क्लेशों से पृथक् वर्त्तमान है, वही सब से मेल करने योग्य है ॥१३॥
Subject
फिर विद्वान् क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥