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Rigveda Mandal 5 / Sukta 44 / Mantra 12

87 Sukta
15 Mantra
5/44/12
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अवत्सारः काश्यप अन्ये च दृष्टलिङ्गाः Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒दा॒पृ॒णो य॑ज॒तो वि द्विषो॑ वधीद्बाहुवृ॒क्तः श्रु॑त॒वित्तर्यो॑ वः॒ सचा॑। उ॒भा स वरा॒ प्रत्ये॑ति॒ भाति॑ च॒ यदीं॑ ग॒णं भज॑ते सुप्र॒याव॑भिः ॥१२॥

स॒दा॒ऽपृ॒णः । य॒ज॒तः । वि । द्विषः॑ । व॒धी॒त् । बा॒हु॒ऽवृ॒क्तः । श्रु॒त॒ऽवित् । तर्यः॑ । वः॒ । सचा॑ । उ॒भा । सः । वरा॑ । प्रति॑ । ए॒ति॒ । भाति॑ । च॒ । यत् । ई॒म् । ग॒णम् । भज॑ते । सु॒प्र॒याव॑ऽभिः ॥

Mantra without Swara
सदापृणो यजतो वि द्विषो वधीद्बाहुवृक्तः श्रुतवित्तर्यो वः सचा। उभा स वरा प्रत्येति भाति च यदीं गणं भजते सुप्रयावभिः ॥

सदाऽपृणः। यजतः। वि। द्विषः। वधीत्। बाहुऽवृक्तः। श्रुतऽवित्। तर्यः। वः। सचा। उभा। सः। वरा। प्रति। एति। भाति। च। यत्। ईम्। गणम्। भजते। सुप्रयावऽभिः ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 25 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्) जो (श्रुतवित्) श्रुत को जाननेवाला (तर्य्यः) जो तैरा जाता वा तैरने के योग्य (सचा) सम्बन्धी (बाहुवृक्तः) बाहुओं से दुष्टों का नाश करनेवाला (यजतः) सत्कर्ता (सदापृणः) सदा तृप्ति करनेवाला (सुप्रयावभिः) उत्तम प्रकार चलनेवालों से (द्विषः) धर्म्म के द्वेष करनेवालों का (वि, वधीत्) विशेष करके नाश करता है (च) और जो (वः) आप लोगों को (प्रति, एति) प्राप्त होता वा विशेष करके जानता है, सत्य (भाति) प्रकाशित होता वा सत्य को प्रकाशित करता और (गणम्) समूह का (भजते) सेवन करता है (सः) वह (उभा) दोनों (वरा) श्रेष्ठ सुनने और सुनानेवालों का (ईम्) ही सत्कार कर सकता है ॥१२॥
Essence
जो बहुत शास्त्रों को सुननेवाले, न्याय का आचरण करनेवाले जन दुष्टों का नाश करते हुए श्रेष्ठों का पालन करते हैं, वे सदा प्रसन्न होते हैं ॥१२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥