Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 5 / Sukta 44 / Mantra 1

87 Sukta
15 Mantra
5/44/1
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- याजुषीपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
तं प्र॒त्नथा॑ पू॒र्वथा॑ वि॒श्वथे॒मथा॑ ज्ये॒ष्ठता॑तिं बर्हि॒षदं॑ स्व॒र्विद॑म्। प्र॒ती॒ची॒नं वृ॒जनं॑ दोहसे गि॒राशुं जय॑न्त॒मनु॒ यासु॒ वर्ध॑से ॥१॥

तम् । प्र॒त्नऽथा॑ । पू॒र्वऽथा॑ । वि॒श्वऽथा॑ । इ॒म्ऽअथा॑ । ज्ये॒ष्ठऽता॑तिम् । ब॒र्हि॒ऽसद॑म् । स्वः॒ऽविद॑म् । प्र॒ती॒ची॒नम् । वृ॒जन॑म् । दो॒ह॒से॒ । गि॒रा । आ॒शुम् । जय॑न्तम् । अनु॑ । यासु॑ । वर्ध॑से ॥

Mantra without Swara
तं प्रत्नथा पूर्वथा विश्वथेमथा ज्येष्ठतातिं बर्हिषदं स्वर्विदम्। प्रतीचीनं वृजनं दोहसे गिराशुं जयन्तमनु यासु वर्धसे ॥

तम्। प्रत्नऽथा। पूर्वऽथा। विश्वऽथा। इमऽथा ज्येष्ठऽतातिम्। बर्हिऽसदम्। स्वःऽविदम्। प्रतीचीनम्। वृजनम्। दोहसे। गिरा। आशुम्। जयन्तम्। अनु। यासु। वर्धसे ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 23 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! जो आप (गिरा) वाणी से (प्रत्नथा) पुराने के सदृश (पूर्वथा) पूर्व के सदृश (विश्वथा) सम्पूर्ण संसार के सदृश (इमथा) इसके सदृश (ज्येष्ठतातिम्) जेठे ही को (बर्हिषदम्) उत्तम आसन वा अन्तरिक्ष में स्थित होनेवाले (स्वर्विदम्) सुख को जानते जिससे उस (प्रतीचीनम्) हम लोगों के सम्मुख प्राप्त होते हुए (वृजनम्) बल को तथा (आशुम्) शीघ्रकारी संग्राम को (जयन्तम्) जीतते हुए को (दोहसे) पूर्ण करते हो (तम्) उन आपको और (यासु) जिनमें (अनु, वर्धसे) वृद्धि को प्राप्त होते हो, उन सेनाओं और उन प्रजाओं की हम लोग निरन्तर वृद्धि करें ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो प्राचीन रीति से प्राचीन उत्तम राजाओं के तुल्य पिता के सदृश राज्य का उत्तम प्रकार पालन करके पूर्ण बलयुक्त सेना को कर शीघ्र विजय को प्राप्त हुई प्रजाओं को सुख के अनुकूल वर्त्तावें, उन्हीं को उत्तम अधिकार में नियुक्त करिये, जिससे राजा और प्रजा का निरन्तर सुख बढ़े ॥१॥
Subject
अब पन्द्रह ऋचावाले चवालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में सूर्यरूपता से राजगुणों को कहते हैं ॥