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Rigveda Mandal 5 / Sukta 43 / Mantra 9

87 Sukta
17 Mantra
5/43/9
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र तव्य॑सो॒ नम॑उक्तिं तु॒रस्या॒हं पू॒ष्ण उ॒त वा॒योर॑दिक्षि। या राध॑सा चोदि॒तारा॑ मती॒नां या वाज॑स्य द्रविणो॒दा उ॒त त्मन् ॥९॥

प्र । तव्य॑सः । नमः॑ऽउक्तिम् । तु॒रस्य॑ । अ॒हम् । पू॒ष्णः । उ॒त । वा॒योः । अ॒दि॒क्षि॒ । या । राध॑सा । चो॒दि॒तारा॑ । म॒ती॒नाम् । या । वाज॑स्य । द्र॒वि॒णः॒ऽदौ । उ॒त । त्मन् ॥

Mantra without Swara
प्र तव्यसो नमउक्तिं तुरस्याहं पूष्ण उत वायोरदिक्षि। या राधसा चोदितारा मतीनां या वाजस्य द्रविणोदा उत त्मन् ॥

प्र। तव्यसः। नमःऽउक्तिम्। तुरस्य। अहम्। पूष्णः। उत। वायोः। अदिक्षि। या। राधसा। चोदितारा। मतीनाम्। या। वाजस्य। द्रविणःऽदौ। उत। त्मन् ॥९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 21 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जनो ! जैसे (अहम्) मैं (तुरस्य) शीघ्र कार्य्य करनेवाले (तव्यसः) बलयुक्त (उत) और (पूष्णः) पुष्टिकारक (वायोः) वायु के (नमउक्तिम्) सत्कार वा अन्न आदि के वचन का (अदिक्षि) उपदेश करता हूँ और (उत) भी (त्मन्) आत्मा में (या) जो (राधसा) धन से (मतीनाम्) मनुष्यों के (प्र, चोदितारा) अत्यन्त प्रेरणा करनेवाले और (या) जो (वाजस्य) विज्ञान वा अन्न के (द्रविणोदौ) बल से देनेवाले वर्त्तमान हैं, उनको उपदेश देता हूँ, वैसे आप लोग भी उपदेश दीजिये ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जैसे विद्वान् जन विद्या के उपदेश और दान से मनुष्यों को उत्तम प्रकार शिक्षित करते हैं, वैसे ही तुम लोग भी करो ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥