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Rigveda Mandal 5 / Sukta 43 / Mantra 8

87 Sukta
17 Mantra
5/43/8
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अच्छा॑ म॒ही बृ॑ह॒ती शंत॑मा॒ गीर्दू॒तो न ग॑न्त्व॒श्विना॑ हु॒वध्यै॑। म॒यो॒भुवा॑ स॒रथा या॑तम॒र्वाग्ग॒न्तं नि॒धिं धुर॑मा॒णिर्न नाभि॑म् ॥८॥

अच्छ॑ । म॒ही । बृ॒ह॒ती । शम्ऽत॑मा । गीः । दू॒तः । न । ग॒न्तु॒ । अ॒श्विना॑ । हु॒वध्यै॑ । म॒यः॒ऽभुवा॑ । स॒रथा॑ । आ । या॒त॒म् । अ॒र्वाक् । ग॒न्तम् । नि॒ऽधिम् । धुर॑म् । आ॒णिः । न । नाभि॑म् ॥

Mantra without Swara
अच्छा मही बृहती शंतमा गीर्दूतो न गन्त्वश्विना हुवध्यै। मयोभुवा सरथा यातमर्वाग्गन्तं निधिं धुरमाणिर्न नाभिम् ॥

अच्छ। मही। बृहती। शम्ऽतमा। गीः। दूतः। न। गन्तु। अश्विना। हुवध्यै। मयःऽभुवा। सऽरथा। आ। यातम्। अर्वाक्। गन्तम्। निऽधिम्। धुरम्। आणिः। न। नाभिम् ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 21 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (बृहती) बड़े ब्रह्म आदि वस्तु को प्रकाश करनेवाली और (शन्तमा) अत्यन्त कल्याणकारिणी (मही) बड़ी (गीः) गाते हैं पदार्थों को जिससे ऐसी वाणी और (मयोभुवा) सुख को उत्पन्न करनेवाले (सरथा) वाहन आदिकों के साथ वर्त्तमान (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक जनों को (हुवध्यै) बुलाने को जैसे (दूतः) धार्म्मिक विद्वान् चतुर राजा का दूत (न) वैसे (गन्तु) प्राप्त हूजिये तथा जिससे अध्यापक और उपदेशक जन (नाभिम्) मध्य (धुरम्) वाहन के आधार काष्ठ को (आणिः) कीले के (न) सदृश और (अर्वाक्) सत्य धर्म्म के पीछे (गन्तम्) चलते हुए (निधिम्) द्रव्यपात्र को (अच्छा) उत्तम प्रकार (आ, यातम्) प्राप्त हूजिये, उसको आप लोग प्राप्त होओ ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । वे ही मनुष्य हैं जिनको जैसे राजा को दूत वैसे सम्पूर्ण शास्त्रों में प्रवीण वाणी प्राप्त होवे और वे ही भाग्यशाली हैं, जिनको धर्मयुक्त पुरुषार्थ से अतुल ऐश्वर्य्य प्राप्त होवे ॥८॥
Subject
फिर उसी विद्वद्विषय को कहते हैं ॥