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Rigveda Mandal 5 / Sukta 43 / Mantra 7

87 Sukta
17 Mantra
5/43/7
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒ञ्जन्ति॒ यं प्र॒थय॑न्तो॒ न विप्रा॑ व॒पाव॑न्तं॒ नाग्निना॒ तप॑न्तः। पि॒तुर्न पु॒त्र उ॒पसि॒ प्रेष्ठ॒ आ घ॒र्मो अ॒ग्निमृ॒तय॑न्नसादि ॥७॥

अ॒ञ्जन्ति॑ । यम् । प्र॒थय॑न्तः । न । विप्राः॑ । व॒पाऽव॑न्तम् । न । अ॒ग्निना॑ । तप॑न्तः । पि॒तुः । न । पु॒त्रः । उ॒पसि॑ । प्रेष्ठः॑ । आ । घ॒र्मः । अ॒ग्निम् । ऋ॒तय॑न् । अ॒सा॒दि॒ ॥

Mantra without Swara
अञ्जन्ति यं प्रथयन्तो न विप्रा वपावन्तं नाग्निना तपन्तः। पितुर्न पुत्र उपसि प्रेष्ठ आ घर्मो अग्निमृतयन्नसादि ॥

अञ्जन्ति। यम्। प्रथयन्तः। न। विप्राः। वपाऽवन्तम्। न। अग्निना। तपन्तः। पितुः। न। पुत्रः। उपसि। प्रेष्ठः। आ। घर्मः। अग्निम्। ऋतयन्। असादि ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 21 Mantra » 2

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Meaning
हे विद्यार्थिन् ! (यम्) जिस (वपावन्तम्) विद्या के बीज के विस्तार को करते हुए के (न) सदृश आप को (अग्निना) अग्नि के सदृश ब्रह्मचर्य्य से (तपन्तः) संताप दुःख को सहते और विद्या के बीज का विस्तार करते हुए के (न) सदृश (प्रथयन्तः) प्रसिद्ध करते हुए (विप्राः) बुद्धिमान जनों के (न) सदृश अग्नि के समान ब्रह्मचर्य्य से सन्ताप दुःख को सहते हुए (अञ्जन्ति) कामना करते वा प्रकट करते हैं और जो (पितुः) पिता के (पुत्रः) पुत्र के सदृश (उपसि) समीप में (प्रेष्ठः) अत्यन्त प्रिय (घर्मः) यज्ञ वा तप (अग्निम्) अग्नि को (ऋतयन्) सत्य के सदृश आचरण करते हुए (आ, असादि) उत्तम प्रकार स्थित होवे, उनको और उसको आप निरन्तर सेवन करके विद्या को ग्रहण करिये ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे अध्यापक विद्वानो ! तुम लोग जो जितेन्द्रिय उत्तम स्वभावयुक्त शीत-उष्ण, सुख-दुःख, आनन्द, शोक, निन्दा-स्तुति आदि द्वन्द्व को सहनेवाले अभिमान और मोह से रहित सत्य आचरणकर्त्ता और परोपकारप्रिय ब्रह्मचारी विद्यार्थी होवें, उनको पुरुषार्थ से विद्वान् करिये ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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