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Rigveda Mandal 5 / Sukta 43 / Mantra 6

87 Sukta
17 Mantra
5/43/6
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ नो॑ म॒हीम॒रम॑तिं स॒जोषा॒ ग्नां दे॒वीं नम॑सा रा॒तह॑व्याम्। मधो॒र्मदा॑य बृह॒तीमृ॑त॒ज्ञामाग्ने॑ वह प॒थिभि॑र्देव॒यानैः॑ ॥६॥

आ । नः॒ । म॒हीम् । अ॒रम॑तिम् । स॒ऽजोषाः॑ । ग्नाम् । दे॒वीम् । नम॑सा । रा॒तऽह॑व्याम् । मधोः॑ । मदा॑य । बृ॒ह॒तीम् । ऋ॒त॒ऽज्ञाम् । आ । अ॒ग्ने॒ । व॒ह॒ । प॒थिऽभिः॑ । दे॒व॒ऽयानैः॑ ॥

Mantra without Swara
आ नो महीमरमतिं सजोषा ग्नां देवीं नमसा रातहव्याम्। मधोर्मदाय बृहतीमृतज्ञामाग्ने वह पथिभिर्देवयानैः ॥

आ। नः। महीम्। अरमतिम्। सऽजोषाः। ग्नाम्। देवीम्। नमसा। रातऽहव्याम्। मधोः। मदाय। बृहतीम्। ऋतऽज्ञाम्। आ। अग्ने। वह। पथिऽभिः। देवऽयानैः ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 21 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! (आ) सब ओर से (सजोषाः) तुल्य प्रीति के सेवन करनेवाले आप (नमसा) सत्कार वा अन्न आदि से (देवयानैः) यथार्थवक्ता विद्वान् चलते हैं जिनसे उन (पथिभिः) मार्गों से (मधोः) मधुर आदि गुण युक्त से (मदाय) आनन्द के लिये (नः) हम लोगों को (अरमतिम्) विषयों में नहीं रमण करती हुई (रातहव्याम्) देने योग्य दान जिससे (ग्नाम्) प्राप्त होते हैं ज्ञान को जिससे तथा (ऋतज्ञाम्) सत्य को जानता है जिससे उस (बृहतीम्) बड़े पदार्थों के विषय से युक्त (देवीम्) देदीप्यमान मनोहर (महीम्) बड़ी वाणी को हम लोगों के लिये (आ, वह) प्राप्त कराइये ॥६॥
Essence
वे ही विद्वान् होते हैं जो सब प्रकार से सब काल में विद्या की याचना करते हैं और वे ही विद्वान् हैं, जो धर्मयुक्त मार्ग से विरुद्ध कुछ भी आचरण नहीं करते हैं ॥६॥
Subject
फिर उसी विद्वद्विषय को कहते हैं ॥