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Rigveda Mandal 5 / Sukta 43 / Mantra 4

87 Sukta
17 Mantra
5/43/4
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दश॒ क्षिपो॑ युञ्जते बा॒हू अद्रिं॒ सोम॑स्य॒ या श॑मि॒तारा॑ सु॒हस्ता॑। मध्वो॒ रसं॑ सु॒गभ॑स्तिर्गिरि॒ष्ठां चनि॑श्चदद्दुदुहे शु॒क्रमं॒शुः ॥४॥

दश॑ । क्षिपः॑ । यु॒ञ्ज॒ते॒ । बा॒हू इति॑ । अद्रि॑म् । सोम॑स्य । या । श॒मि॒तारा॑ । सु॒ऽहस्ता॑ । मध्वः॑ । रस॑म् । सु॒ऽगभ॑स्तिः । गि॒रि॒ऽस्थाम् । चनि॑श्चदत् । दु॒दु॒हे॒ । शु॒क्रम् । अं॒शुः ॥

Mantra without Swara
दश क्षिपो युञ्जते बाहू अद्रिं सोमस्य या शमितारा सुहस्ता। मध्वो रसं सुगभस्तिर्गिरिष्ठां चनिश्चदद्दुदुहे शुक्रमंशुः ॥

दश। क्षिपः। युञ्जते। बाहू इति। अद्रिम्। सोमस्य। या। शमितारा। सुऽहस्ता। मध्वः। रसम्। सुऽगभस्तिः। गिरिऽस्थाम्। चनिश्चदत्। दुदुहे। शुक्रम्। अंशुः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 20 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (सुगभस्तिः) सुन्दर किरणें जिसकी वह सूर्य्य और (अंशुः) किरण (चनिश्चदत्) प्रसन्न करता है और (मध्वः) मधुर आदि गुणों से युक्त (सोमस्य) ऐश्वर्य्य के सम्बन्धी (गिरिष्ठाम्) मेघ में वर्त्तमान (अद्रिम्) मेघ को (रसम्) रस को और (शुक्रम्) जल को (दुदुहे) दुहता है, वैसे जो (दश) दश संख्यावाली (क्षिपः) प्रेरणा करते हैं जिनसे वे अङ्गुलियाँ और (या) जो (शमितारा) शान्ति से यज्ञकर्म्म के करनेवाले और (सुहस्ता) अच्छे हाथोंवाले (बाहू) भुजाओं को (युञ्जते) युक्त करते हैं, उनसे धर्मसम्बन्धी कार्य्यों को करो ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य आदि प्राणी अङ्गुलियों से पदार्थों को ग्रहण करते और त्यागते हैं, वैसे ही सूर्य्य किरणों से भूमि के नीचे से जल को ग्रहण करके फेंकता अर्थात् वृष्टि करता है, ऐसा जानो ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥