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Rigveda Mandal 5 / Sukta 43 / Mantra 3

87 Sukta
17 Mantra
5/43/3
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अध्व॑र्यवश्चकृ॒वांसो॒ मधू॑नि॒ प्र वा॒यवे॑ भरत॒ चारु॑ शु॒क्रम्। होते॑व नः प्रथ॒मः पा॑ह्य॒स्य देव॒ मध्वो॑ ररि॒मा ते॒ मदा॑य ॥३॥

अध्व॑र्यवः । च॒कृ॒ऽवांसः॑ । मधू॑नि । प्र । वा॒यवे॑ । भ॒र॒त॒ । चारु॑ । शु॒क्रम् । होता॑ऽइव । नः॒ । प्र॒थ॒मः । पा॒हि॒ । अ॒स्य । देव॑ । मध्वः॑ । र॒रि॒म । ते॒ । मदा॑य ॥

Mantra without Swara
अध्वर्यवश्चकृवांसो मधूनि प्र वायवे भरत चारु शुक्रम्। होतेव नः प्रथमः पाह्यस्य देव मध्वो ररिमा ते मदाय ॥

अध्वर्यवः। चकृऽवांसः। मधूनि। प्र। वायवे। भरत। चारु। शुक्रम्। होताऽइव। नः। प्रथमः। पाहि। अस्य। देव। मध्वः। ररिम। ते। मदाय ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 20 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (देव) विद्वन् (प्रथमः) पहिले आप (होतेव) दाता जन के सदृश (अस्य) इस (मध्वः) मधुर के मध्य में (नः) हम लोगों की (पाहि) रक्षा करिये, जिससे हम लोग (ते) आपके (मदाय) आनन्द के लिये (ररिमा) क्रीड़ा करें । हे (चक्रिवांसः) कार्य्य करते हुए और (अध्वर्य्यवः) अपनी अहिंसा की इच्छा करते हुए आप लोग (वायवे) वायुविद्या के लिये (मधूनि) विज्ञानों और (चारु) सुन्दर (शुक्रम्) जल को (प्र, भरत) उत्तम प्रकार धारण कीजिये ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे हवन करनेवाला होम से सब के हित को सिद्ध करता है, वैसे ही सब के हित के लिये वायु और जल की विद्या को विस्तारिये, जिससे सब हम लोग आनन्दित हुए वर्त्ताव करें ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥