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Rigveda Mandal 5 / Sukta 43 / Mantra 2

87 Sukta
17 Mantra
5/43/2
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ सु॑ष्टु॒ती नम॑सा वर्त॒यध्यै॒ द्यावा॒ वाजा॑य पृथि॒वी अमृ॑ध्रे। पि॒ता मा॒ता मधु॑वचाः सु॒हस्ता॒ भरे॑भरे नो य॒शसा॑वविष्टाम् ॥२॥

आ । सु॒ऽस्तु॒ती । नम॑सा । व॒र्त॒यध्यै॑ । द्यावा॑ । वाजा॑य । पृ॒थि॒वी इति॑ । अमृ॑ध्रे॒ इति॑ । पि॒ता । मा॒ता । मधु॑ऽवचाः । सु॒ऽहस्ता॑ । भरे॑ऽभरे । नः॒ । य॒शसौ॑ । अ॒वि॒ष्टा॒म् ॥

Mantra without Swara
आ सुष्टुती नमसा वर्तयध्यै द्यावा वाजाय पृथिवी अमृध्रे। पिता माता मधुवचाः सुहस्ता भरेभरे नो यशसावविष्टाम् ॥

आ। सुऽस्तुती। नमसा। वर्तयध्यै। द्यावा। वाजाय। पृथिवी इति। अमृध्रे इति। पिता। माता। मधुऽवचाः। सुऽहस्ता। भरेऽभरे। नः। यशसौ। अविष्टाम् ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 20 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! आप लोगों से (वाजाय) विज्ञान के लिये (सुष्टुती) श्रेष्ठ प्रशंसा से (नमसा) सत्कार वा अन्न आदि से (अमृध्रे) नहीं हिंसा किये गये में (सुहस्ता) सुन्दर हस्त जिनके वे (यशसौ) यश और धन से युक्त (द्यावा) अन्तरिक्ष और (पृथिवी) पृथिवी (मधुवचाः) मधुर वचन जिसका ऐसा वा (पिता) पिता और (माता) माता के सदृश (भरेभरे) संग्राम संग्राम में (नः) हम लोगों को (अविष्टाम्) प्राप्त होवें, वे (आ, वर्त्तयध्यै) उत्तम प्रकार वर्त्ताव करने को प्राप्त होवें ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे माता और पिता अपने सन्तानों को उत्तम प्रकार शिक्षा देकर और वृद्धि करके विजयकारी करते हैं, वैसे ही प्राप्त हुई सूर्य्य और पृथिवी की विद्या सर्वत्र विजय को प्राप्त होती हैं ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥