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Rigveda Mandal 5 / Sukta 43 / Mantra 14

87 Sukta
17 Mantra
5/43/14
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मा॒तुष्प॒दे प॑र॒मे शु॒क्र आ॒योर्वि॑प॒न्यवो॑ रास्पि॒रासो॑ अग्मन्। सु॒शेव्यं॒ नम॑सा रा॒तह॑व्याः॒ शिशुं॑ मृजन्त्या॒यवो॒ न वा॒से ॥१४॥

मा॒तुः । प॒दे । प॒र॒मे । शु॒क्रे । आ॒योः । वि॒प॒न्यवः॑ । रा॒स्पि॒रासः॑ । अ॒ग्म॒न् । सु॒ऽशेव्य॑म् । नम॑सा । रा॒तऽह॑व्याः । शिशु॑म् । मृ॒ज॒न्ति॒ । आ॒यवः॑ । न । वा॒से ॥

Mantra without Swara
मातुष्पदे परमे शुक्र आयोर्विपन्यवो रास्पिरासो अग्मन्। सुशेव्यं नमसा रातहव्याः शिशुं मृजन्त्यायवो न वासे ॥

मातुः। पदे। परमे। शुक्रे। आयोः। विपन्यवः। रास्पिरासः। अग्मन्। सुऽशेव्यम्। नमसा। रातऽहव्याः। शिशुम्। मृजन्ति। आयवः। न। वासे ॥१४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 22 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (शुक्रे) शुद्ध (परमे) उत्तम (मातुः) माता के सदृश वर्त्तमान भूमि के (पदे) प्राप्त होने योग्य स्थान में (आयोः) जीवन के (विपन्यवः) विशेषतया स्तुति करने और और (रास्पिरासः) दोनों की प्रीति करनेवाले (रातहव्याः) दिये हुओं के देने योग्य (नमसा) सत्कार वा अन्न आदि से (वासे) वसने में (आयवः) मनुष्य (शिशुम्) शासन करने योग्य बालक को (मृजन्ति) शुद्ध करते हैं (न) जैसे वैसे (सुशेव्यम्) उत्तम सुखों में हुए व्यवहार को (अग्मन्) प्राप्त होते हैं, वे उत्तम प्रकार सुखों से युक्त होते हैं ॥१४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे माता शीघ्र उत्पन्न हुए बालक को उत्तम प्रकार शुद्ध करके उत्तम स्थान में रक्षा करती है, वैसे ही जो योगाभ्यास में चित्त को शुद्ध करते हैं, वे ऐश्वर्य्य के सहित सुख को प्राप्त होते हैं ॥१४॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥