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Rigveda Mandal 5 / Sukta 43 / Mantra 12

87 Sukta
17 Mantra
5/43/12
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ वे॒धसं॒ नील॑पृष्ठं बृ॒हन्तं॒ बृह॒स्पतिं॒ सद॑ने सादयध्वम्। सा॒दद्यो॑निं॒ दम॒ आ दी॑दि॒वांसं॒ हिर॑ण्यवर्णमरु॒षं स॑पेम ॥१२॥

आ । वे॒धस॑म् । नील॑ऽपृष्ठम् । बृ॒हन्त॑म् । बृह॒स्पति॑म् । सद॑ने । सा॒द॒य॒ध्व॒म् । सा॒दत्ऽयो॑निम् । दमे॑ । आ । दी॒दि॒ऽवांसम् । हिर॑ण्यऽवर्णम् । अ॒रु॒षम् । स॒पे॒म॒ ॥

Mantra without Swara
आ वेधसं नीलपृष्ठं बृहन्तं बृहस्पतिं सदने सादयध्वम्। सादद्योनिं दम आ दीदिवांसं हिरण्यवर्णमरुषं सपेम ॥

आ। वेधसम्। नीलऽपृष्ठम्। बृहन्तम्। बृहस्पतिम्। सदने। सादयध्वम्। सादत्ऽयोनिम्। दमे। आ। दीदिऽवांसम्। हिरण्यऽवर्णम्। अरुषम्। सपेम ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 22 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे बुद्धिमान् जनो ! आप लोग (नीलपृष्ठम्) नीलगुण से युक्त पृष्ठ जिसका उस (बृहन्तम्) बड़े (बृहस्पतिम्) बड़ों के स्वामी (वेधसम्) बुद्धिमान् को (सदने) सभा के स्थान में (आ, सादयध्वम्) उत्तम प्रकार स्थित कीजिये। और हम लोग (सादद्योनिम्) धर्मसम्बन्धी कारण में स्थित होते और (दीदिवांसम्) निरन्तर प्रकाशमान देनेवाले (हिरण्यवर्णम्) तेजस्वी (अरुषम्) मर्मविद्या में स्थित होते हुए को (दमे) गृह में अर्थात् सभास्थान में (आ, सपेम) अच्छे प्रकार सपथों से नियत करावें ॥१२॥
Essence
वे ही मनुष्य राज्य करने और बढ़ाने को समर्थ होवें, जो धर्मिष्ठ और किये हुए उपकारों को जाननेवाले, कुलीन विद्वानों को सभा में स्थित करें तथा वहाँ स्थापनसमय में सपथों से आप लोग अन्याय को कभी मत करो, ऐसा प्रलम्भन करावें ॥१२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥