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Rigveda Mandal 5 / Sukta 43 / Mantra 11

87 Sukta
17 Mantra
5/43/11
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ नो॑ दि॒वो बृ॑ह॒तः पर्व॑ता॒दा सर॑स्वती यज॒ता ग॑न्तु य॒ज्ञम्। हवं॑ दे॒वी जु॑जुषा॒णा घृ॒ताची॑ श॒ग्मां नो॒ वाच॑मुश॒ती शृ॑णोतु ॥११॥

आ । नः॒ । दि॒वः । बृ॒ह॒तः । पर्व॑तात् । आ । सर॑स्वती । य॒ज॒ता । ग॒न्तु॒ । य॒ज्ञम् । हव॑म् । दे॒वी । जु॒जु॒षा॒णा । घृ॒ताची॑ । श॒ग्माम् । नः॒ । वाच॑म् । उ॒श॒ती । शृ॒णो॒तु॒ ॥

Mantra without Swara
आ नो दिवो बृहतः पर्वतादा सरस्वती यजता गन्तु यज्ञम्। हवं देवी जुजुषाणा घृताची शग्मां नो वाचमुशती शृणोतु ॥

आ। नः। दिवः। बृहतः। पर्वतात्। आ। सरस्वती। यजता। गन्तु। यज्ञम्। हवम्। देवी। जुजुषाणा। घृताची। शग्माम्। नः। वाचम्। उशती। शृणोतु ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 22 Mantra » 1

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Meaning
हे विद्यार्थी जनो ! जैसे यह (यजता) उत्तम प्रकार प्राप्त होने योग्य (सरस्वती) विज्ञानयुक्त वाणी (दिवः) कामना करते हुए (बृहतः) महदाशययुक्त (नः) हम लोगों को (पर्वतात्) मेघ से जल के सदृश (आ, गन्तु) सब प्रकार प्राप्त होवे (घृताची) घृत को प्राप्त होनेवाली (जुजुषाणा) उत्तम प्रकार से सेवन की गई (देवी) श्रेष्ठ गुण और शास्त्र के बोध से युक्त (उशती) कामना करती हुई विद्यायुक्त स्त्री (नः) हम लोगों के (यज्ञम्) विद्याव्यवहार को (हवम्) कहने-सुनने योग्य व्यवहार को वा (शग्माम्) सुखमयी (वाचम्) वाणी को और हम लागों को (आ, शृणोतु) अच्छे प्रकार सुने, वैसे आप लोगों को भी प्राप्त हुई यह आप लोगों के कृत्य को सुने ॥११॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । उन्हीं को श्रेष्ठ वाणी प्राप्त होती है, जो सत्य की कामना करनेवाले, महाशय, परोपकारप्रिय, धर्मिष्ठ और विद्यार्थियों के परीक्षक होवें ॥११॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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