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Rigveda Mandal 5 / Sukta 43 / Mantra 10

87 Sukta
17 Mantra
5/43/10
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ नाम॑भिर्म॒रुतो॑ वक्षि॒ विश्वा॒ना रू॒पेभि॑र्जातवेदो हुवा॒नः। य॒ज्ञं गिरो॑ जरि॒तुः सु॑ष्टु॒तिं च॒ विश्वे॑ गन्त मरुतो॒ विश्व॑ ऊ॒ती ॥१०॥

आ । नाम॑ऽभिः । म॒रुतः॑ । व॒क्षि॒ । विश्वा॑न् । आ । रू॒पेभिः॑ । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ । हु॒वा॒नः । य॒ज्ञम् । गिरः॑ । ज॒रि॒तुः । सु॒ऽस्तु॒तिम् । च॒ । विश्वे॑ । ग॒न्त॒ । म॒रु॒तः॒ । विश्वे॑ । ऊ॒ती ॥

Mantra without Swara
आ नामभिर्मरुतो वक्षि विश्वाना रूपेभिर्जातवेदो हुवानः। यज्ञं गिरो जरितुः सुष्टुतिं च विश्वे गन्त मरुतो विश्व ऊती ॥

आ। नामऽभिः। मरुतः। वक्षि। विश्वान्। आ। रूपेभिः। जातऽवेदः। हुवानः। यज्ञम्। गिरः। जरितुः। सुऽस्तुतिम्। च। विश्वे। गन्त। मरुतः। विश्वे। ऊती ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 21 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (जातवेदः) बुद्धि से युक्त (हुवानः) दान करते हुए आप (नामभिः) संज्ञाओं और (रूपेभिः) रूपों से (विश्वान्) सम्पूर्ण (मरुतः) मनुष्यों को (आ) सब प्रकार (वक्षि) प्राप्त हूजिये (जरितुः) स्तुति करनेवाले की (सुष्टुतिम्) स्तुति करनेवाले की उत्तम प्रशंसा को (गिरः) वाणियों को (यज्ञम्, च) और संगति करने को (विश्वे) सम्पूर्ण (गन्त) प्राप्त होवें तथा (विश्वे) समस्त (मरुतः) मनुष्यों को (ऊती) रक्षण आदि क्रिया से (आ) प्राप्त होवें ॥१०॥
Essence
हे विद्वन् ! आप सम्पूर्ण नाम और रूप आदिकों से सम्पूर्ण पदार्थों को सम्पूर्ण मनुष्यों के लिये साक्षात् कराओ, जिससे सब मनुष्य प्रशंसित होकर सब को प्रशंसित विद्यायुक्त सम्पादित करें ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥