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Rigveda Mandal 5 / Sukta 42 / Mantra 9

87 Sukta
18 Mantra
5/42/9
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि॒स॒र्माणं॑ कृणुहि वि॒त्तमे॑षां॒ ये भु॒ञ्जते॒ अपृ॑णन्तो न उ॒क्थैः। अप॑व्रतान्प्रस॒वे वा॑वृधा॒नान्ब्र॑ह्म॒द्विषः॒ सूर्या॑द्यावयस्व ॥९॥

वि॒ऽस॒र्माण॑म् । कृ॒णु॒हि॒ । वि॒त्तम् । ए॒षा॒म् । ये । भु॒ञ्जते॑ । अपृ॑णन्तः । नः॒ । उ॒क्थैः । अप॑ऽव्रतान् । प्र॒ऽस॒वे । व॒वृ॒धा॒नान् । ब्र॒ह्म॒ऽद्विषः॑ । सूर्या॑त् । य॒व॒य॒स्व॒ ॥

Mantra without Swara
विसर्माणं कृणुहि वित्तमेषां ये भुञ्जते अपृणन्तो न उक्थैः। अपव्रतान्प्रसवे वावृधानान्ब्रह्मद्विषः सूर्याद्यावयस्व ॥

विऽसर्माणम्। कृणुहि। वित्तम्। एषाम्। ये। भुञ्जते। अपृणन्तः। नः। उक्थैः। अपऽव्रतान्। प्रऽसवे। ववृधानान्। ब्रह्मऽद्विषः। सूर्यात्। यवयस्व ॥९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 18 Mantra » 4

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Meaning
हे विद्वन् ! (ये) जो (अपृणन्तः) नहीं पूर्ण वा नहीं पालन करते हुए (भुञ्जते) भोगते हैं और (नः) हमारे (उक्थैः) उत्तम वाक्यों से (प्रसवे) उत्पन्न हुए जगत् में (वावृधानान्) अत्यन्त बढ़ते हुए (अपव्रतान्) ब्रह्मचर्य्य, सत्यभाषणादि व्रताचाररहित (ब्रह्मद्विषः) वेद वा परमात्मा से द्वेष करनेवालों को रोकते हैं (एषाम्) इन लोगों के (विसर्म्माणम्) उत्पन्न करनेवाले (वित्तम्) धन वा भोग को (कृणुहि) करो और (सूर्य्यात्) सूर्य्य से उनको (यावयस्व) अमिश्रित करो ॥९॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो लोग शुद्ध आचरणों से रहितों को शुद्ध आचरणों के सहित और अविद्वानों को विद्वान् करके नास्तिकों को रोक के अधर्म्म के आचरण से पृथक् होके निरन्तर सुखी करते, वे निरन्तर आदर करने योग्य होते हैं ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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