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Rigveda Mandal 5 / Sukta 42 / Mantra 6

87 Sukta
18 Mantra
5/42/6
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
म॒रुत्व॑तो॒ अप्र॑तीतस्य जि॒ष्णोरजू॑र्यतः॒ प्र ब्र॑वामा कृ॒तानि॑। न ते॒ पूर्वे॑ मघव॒न्नाप॑रासो॒ न वी॒र्यं१॒॑ नूत॑नः॒ कश्च॒नाप॑ ॥६॥

म॒रुत्व॑तः । अप्र॑तिऽइतस्य । जि॒ष्णोः । अजू॑र्यतः । प्र । ब्र॒वा॒म॒ । कृ॒तानि॑ । न । ते॒ । पूर्वे॑ । म॒घ॒ऽव॒न् । न । अप॑रासः । न । वी॒र्य॑म् । नूत॑नः । कः । च॒न । आ॒प॒ ॥

Mantra without Swara
मरुत्वतो अप्रतीतस्य जिष्णोरजूर्यतः प्र ब्रवामा कृतानि। न ते पूर्वे मघवन्नापरासो न वीर्यं१ नूतनः कश्चनाप ॥

मरुत्वतः। अप्रतिऽइतस्य। जिष्णोः। अजूर्यतः। प्र। ब्रवाम। कृतानि। न। ते। पूर्वे। मघऽवन्। न। अपरासः। न। वीर्यम्। नूतनः। कः। चन। आप ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 18 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) अत्यन्त श्रेष्ठ धन से युक्त और अत्यन्त विद्यावाले विद्वान् वा अतिबलवान् राजन् ! (मरुत्वतः) प्रशंसित विद्वानों से युक्त (अप्रतीतस्य) प्रतीति के अविषय (अजूर्य्यतः) जिसको जीर्ण अवस्था नहीं प्राप्त हुई ऐसे (जिष्णोः) जीतनेवाले (ते) आपके जिन (कृतानि) कृत्यों का हम लोग (प्र, ब्रवामा) उपदेश देवें उनको (न)(पूर्वे) प्राचीनजन (न)(अपरासः) पीछे से हुए जन व्याप्त होते हैं और (नूतनः) नवीन (कः, चन) कोई भी, आपके (वीर्य्यम्) पराक्रम को (न) नहीं (आप) व्याप्त होता है ॥६॥
Essence
विद्वानों को चाहिये कि उन्हीं प्रशंसित कर्मवालों के कृत्यों को अन्य जनों के लिये उपदेश देवें, जिनके कर्म अप्रतिहत अर्थात् नष्ट नहीं होते हैं ॥६॥
Subject
फिर विद्वानों के विषय को कहते हैं ॥