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Rigveda Mandal 5 / Sukta 42 / Mantra 4

87 Sukta
18 Mantra
5/42/4
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
समि॑न्द्र णो॒ मन॑सा नेषि॒ गोभिः॒ सं सू॒रिभि॑र्हरिवः॒ सं स्व॒स्ति। सं ब्रह्म॑णा दे॒वहि॑तं॒ यदस्ति॒ सं दे॒वानां॑ सुम॒त्या य॒ज्ञिया॑नाम् ॥४॥

सम् । इ॒न्द्र॒ । नः॒ । मन॑सा । ने॒षि॒ । गोभिः॑ । सम् । सू॒रिऽभिः॑ । ह॒रि॒ऽवः॒ । सम् । स्व॒स्ति । सम् । ब्रह्म॑णा । दे॒वऽहि॑त॒म् । यत् । अस्ति॑ । सम् । दे॒वाना॑म् । सु॒ऽम॒त्या । य॒ज्ञिया॑नाम् ॥

Mantra without Swara
समिन्द्र णो मनसा नेषि गोभिः सं सूरिभिर्हरिवः सं स्वस्ति। सं ब्रह्मणा देवहितं यदस्ति सं देवानां सुमत्या यज्ञियानाम् ॥

सम्। इन्द्र। नः। मनसा। नेषि। गोभिः। सम्। सूरिऽभिः। हरिऽवः। सम्। स्वस्ति। सम्। ब्रह्मणा। देवऽहितम्। यत्। अस्ति। सम्। देवानाम्। सुऽमत्या। यज्ञियानाम् ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 17 Mantra » 4

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Meaning
हे (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य्य से युक्त जिससे आप (यत्) जो (गोभिः) इन्द्रियों वा वाणियों के साथ (सम्, स्वस्ति) उत्तम सुख (अस्ति) है वह (नः) हम लोगों को (मनसा) विज्ञान के साथ (सम्, नेषि) अच्छे प्रकार प्राप्त करते हैं और हे (हरिवः) श्रेष्ठ मनुष्यों से युक्त ! जो (सूरिभिः) विद्वानों के साथ सुख है, वह हम लोगों को (सम्) एक साथ प्राप्त करते हैं और जो (ब्रह्मणा) वेद, धन वा अन्न के साथ (देवहितम्) विद्वानों का हितकारक सुख है, वह हम लोगों को (सम्) एक साथ प्राप्त करते हैं और जो (यज्ञियानाम्) यज्ञ करनेवाले (देवानाम्) विद्वानों की (सुमत्या) श्रेष्ठ बुद्धि के साथ विद्वानों का हितकारक सुख है, वह हम लोगों के लिये (सम्) एक साथ प्राप्त करते हैं, इससे सत्कार करने योग्य हो ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! आप लोग सत्यवाणी, विद्वानों का सङ्ग, वेदविद्या और श्रेष्ठ बुद्धि के सहित उत्तम प्रकार शोभित हुए अभीष्ट सुख को प्राप्त हूजिये ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥