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Rigveda Mandal 5 / Sukta 42 / Mantra 3

87 Sukta
18 Mantra
5/42/3
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उदी॑रय क॒वित॑मं कवी॒नामु॒नत्तै॑नम॒भि मध्वा॑ घृ॒तेन॑। स नो॒ वसू॑नि॒ प्रय॑ता हि॒तानि॑ च॒न्द्राणि॑ दे॒वः स॑वि॒ता सु॑वाति ॥३॥

उत् । ई॒र॒य॒ । क॒विऽत॑मम् । क॒वी॒नाम् । उ॒नत्त॑ । ए॒न॒म् । अ॒भि । मध्वा॑ । घृ॒तेन॑ । सः । नः॒ । वसू॑नि । प्रऽय॑ता । हि॒तानि॑ । च॒न्द्राणि॑ । दे॒वः । स॒वि॒ता । सु॒वा॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
उदीरय कवितमं कवीनामुनत्तैनमभि मध्वा घृतेन। स नो वसूनि प्रयता हितानि चन्द्राणि देवः सविता सुवाति ॥

उत्। ईरय। कविऽतमम्। कवीनाम्। उनत्त। एनम्। अभि। मध्वा। घृतेन। सः। नः। वसूनि। प्रऽयता। हितानि। चन्द्राणि। देवः। सविता। सुवाति ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 17 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे खेत बोनेवाले जन (मध्वा) मधुर (घृतेन) जल से क्षेत्र आदि सींच कर अन्नादिकों को प्राप्त होते हैं, वैसे ही (एनम्) इस (कवीनाम्) बुद्धिमानों के मध्य में (कवितमम्) अत्यन्त बुद्धिमान् को (उत्, ईरय) उत्तमता से प्रेरणा देओ तथा (अभि, उनत्त) अभ्युदय के अर्थ विद्या और उत्तम शिक्षा से सींचो और हे विद्वन् ! जिस कवियों के मध्य में श्रेष्ठ कवि की प्रेरणा करो (सः) वह (सविता) विद्या और ऐश्वर्य्य का करनेवाला (देवः) विद्वान् (नः) हम लोगों के लिये (प्रयता) प्रयत्न से सिद्ध होने योग्य (चन्द्राणि) आनन्द के देनेवाले सुवर्ण आदि (हितानि) हितकारक (वसूनि) द्रव्यों को (सुवाति) देवे ॥३॥
Essence
हे विद्वान् अध्यापक पुरुषो ! आप लोग जो निश्चय करके सब से उत्तम, सम्पूर्ण विद्याओं से युक्त, श्रेष्ठ विद्वान् होवे, उसको गृहाश्रम न कर, ऐसा उपदेश दीजिये। जिससे संसार में वर्त्तमान मनुष्यों का बड़ा सुख बढ़े, क्योंकि जो निश्चय करके पूर्ण विद्यायुक्त होकर गृहाश्रम को करे, वह बहुत व्यापारवान् होने से, वीर्य्य आदि के नाश होने से, थोड़ी अवस्थायुक्त होकर निरन्तर मनुष्यों के हित करने को नहीं समर्थ होवे ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥