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Rigveda Mandal 5 / Sukta 42 / Mantra 2

87 Sukta
18 Mantra
5/42/2
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- याजुषीपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्रति॑ मे॒ स्तोम॒मदि॑तिर्जगृभ्यात्सू॒नुं न मा॒ता हृद्यं॑ सु॒शेव॑म्। ब्रह्म॑ प्रि॒यं दे॒वहि॑तं॒ यदस्त्य॒हं मि॒त्रे वरु॑णे॒ यन्म॑यो॒भु ॥२॥

प्रति॑ । मे॒ । स्तोम॑म् । अदि॑तिः । ज॒गृ॒भ्या॒त् । सू॒नुम् । न । मा॒ता । हृद्य॑म् । सु॒ऽशेव॑म् । ब्रह्म॑ । प्रि॒यम् । दे॒वऽहि॑तम् । यत् । अस्ति॑ । अ॒हम् । मि॒त्रे । वरु॑णे । यत् । म॒यः॒ऽभुः ॥

Mantra without Swara
प्रति मे स्तोममदितिर्जगृभ्यात्सूनुं न माता हृद्यं सुशेवम्। ब्रह्म प्रियं देवहितं यदस्त्यहं मित्रे वरुणे यन्मयोभु ॥

प्रति। मे। स्तोमम्। अदितिः। जगृभ्यात्। सूनुम्। न। माता। हृद्यम्। सुऽशेवम्। ब्रह्म। प्रियम्। देवऽहितम्। यत्। अस्ति। अहम्। मित्रे। वरुणे। यत्। मयःऽभु ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 17 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! (अदितिः) पूर्ण सुख की देनेवाली (माता) माता (हृद्यम्) हृदय के प्रिय (सूनुम्) सन्तान के (न) सदृश जो (मे) मेरी (स्तोमम्) स्तुति को (प्रति, जगृभ्यात्) अत्यन्त ग्रहण करे और (यत्) जिस (सुशेवम्) उत्तम प्रकार सुख देनेवाले (प्रियम्) सुन्दर और प्रीतिकारक तथा (देवहितम्) देव अर्थात् विद्वानों के लिये हितकारक (ब्रह्म) सत्, चित् और आनन्दस्वरूप चेतन (अस्ति) है और (यत्) जो (मित्रे) प्राणवायु और (वरुणे) उदान वायु में (मयोभु) सुखकारक है, उसको (अहम्) मैं इष्ट मानता हूँ, वैसे आप लोग भी मानिये ॥२॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो जगदीश्वर प्रेमभाव से स्तुति किया गया और जो उसकी आज्ञा का सेवन किया हो तो वह जैसे कृपा करनेवाली माता शीघ्र उत्पन्न हुए बालक पर वैसे धार्मिक उपासक जन पर दया करता है, जो जगदीश्वर सर्वत्र व्याप्त हुआ भी प्राणादिकों में पाया जाता है, उस सब काल में सुख देनेवाले परमात्मा की हम उपासना करें ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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