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Rigveda Mandal 5 / Sukta 42 / Mantra 16

87 Sukta
18 Mantra
5/42/16
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्रैष स्तोमः॑ पृथि॒वीम॒न्तरि॑क्षं॒ वन॒स्पतीँ॒रोष॑धी रा॒ये अ॑श्याः। दे॒वोदे॑वः सु॒हवो॑ भूतु॒ मह्यं॒ मा नो॑ मा॒ता पृ॑थि॒वी दु॑र्म॒तौ धा॑त् ॥१६॥

प्र । ए॒षः । स्तोमः॑ । पृ॒थि॒वीम् । अ॒न्तरि॑क्षम् । वन॒स्पती॑न् । ओष॑धीः । रा॒ये । अ॒श्याः॒ । दे॒वःऽदे॑वः । सु॒ऽहवः॑ । भू॒तु॒ । मह्य॑म् । मा । नः॒ । मा॒ता । पृ॒थि॒वी । दुः॒ऽम॒तौ । धा॒त् ॥

Mantra without Swara
प्रैष स्तोमः पृथिवीमन्तरिक्षं वनस्पतीँरोषधी राये अश्याः। देवोदेवः सुहवो भूतु मह्यं मा नो माता पृथिवी दुर्मतौ धात् ॥

प्र। एषः। स्तोमः। पृथिवीम्। अन्तरिक्षम्। वनस्पतीन्। ओषधीः। राये। अश्याः। देवःऽदेवः। सुऽहवः। भूतु। मह्यम्। मा। नः। माता। पृथिवी। दुःऽमतौ। धात् ॥१६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 19 Mantra » 6

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Meaning
हे विद्वन् ! (देवोदेवः) विद्वान् विद्वान् (सुहवः) उत्तम प्रकार ग्रहण करनेवाले और दाता आप और जो (एषः) यह (स्तोमः) प्रशंसा करने योग्य मेघ वा वह्नि (राये) धन के लिये (पृथिवीम्) भूमि (अन्तरिक्षम्) आकाश और (ओषधीः) यव आदि औषधियाँ तथा (वनस्पतीन्) वट और अश्वत्थ आदि वनस्पतियों को प्राप्त होता है उसको आप (प्र, अश्याः) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये वह (मह्यम्) मेरे लिये सुखकारक (भूतु) होवे जिससे यह (पृथिवी) पृथिवी (माता) माता के सदृश पालन करनेवाली (नः) हम लोगों को (दुर्म्मतौ) दुष्टबुद्धि में (मा) नहीं (धात्) धारण करे ॥१६॥
Essence
सब स्त्री और पुरुष विद्वान् होकर बिजुली और मेघ आदि की विद्या को ग्रहण करें जिससे यह विद्या आप लोगों की माता के सदृश पालना करे और जैसे माता उत्तम शिक्षा से अपने सन्तानों को उत्तम करती है, वैसे ही मेघवृष्टिविद्या से युक्त भूमि उत्तम अन्न आदिकों को उत्पन्न करती है ॥१६॥
Subject
फिर विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥