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Rigveda Mandal 5 / Sukta 42 / Mantra 15

87 Sukta
18 Mantra
5/42/15
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒ष स्तोमो॒ मारु॑तं॒ शर्धो॒ अच्छा॑ रु॒द्रस्य॑ सू॒नूँर्यु॑व॒न्यूँरुद॑श्याः। कामो॑ रा॒ये ह॑वते मा स्व॒स्त्युप॑ स्तुहि॒ पृष॑दश्वाँ अ॒यासः॑ ॥१५॥

ए॒षः । स्तोमः॑ । मारु॑तम् । शर्धः॑ । अच्छ॑ । रु॒द्रस्य॑ । सू॒नून् । यु॒व॒न्यून् । उत् । अ॒श्याः॒ । कामः॑ । रा॒ये । ह॒व॒ते॒ । मा॒ । स्व॒स्ति । उप॑ । स्तु॒हि॒ । पृष॑त्ऽअश्वान् । अ॒यासः॑ ॥

Mantra without Swara
एष स्तोमो मारुतं शर्धो अच्छा रुद्रस्य सूनूँर्युवन्यूँरुदश्याः। कामो राये हवते मा स्वस्त्युप स्तुहि पृषदश्वाँ अयासः ॥

एषः। स्तोमः। मारुतम्। शर्धः। अच्छ। रुद्रस्य। सूनून्। युवन्यून्। उत्। अश्याः। कामः। राये। हवते। मा। स्वस्ति। उप। स्तुहि। पृषत्ऽअश्वान्। अयासः ॥१५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 19 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! जो (कामः) इच्छा (मा) मुझ को (राये) धन के लिये (स्वस्ति) सुख को (हवते) ग्रहण करती है उसकी (उप, स्तुहि) समीप में स्तुति प्रशंसा कीजिये और जो (अयासः) चलते हुए (पृषदश्वान्) सींचनेवाले तथा शीघ्र चलेवाले पदार्थों को प्राप्त होते हैं उन (युवन्यून्) अपने मिले और नहीं मिले हुए पदार्थों की इच्छा करते हुओं को आप (उत्, अश्याः) अत्यन्त प्राप्त हूजिये और जो (एषः) यह (स्तोमः) प्रशंसा का विषय (मारुतम्) मनुष्यों के इस (शर्धः) बल को ग्रहण करता है उस (रुद्रस्य) प्राण आदि है रूप जिसका ऐसे वायु के (सूनून्) उत्पत्ति के गुणों को (अच्छा) उत्तम प्रकार प्राप्त हूजिये ॥१५॥
Essence
हे मनुष्यो ! आप लोग वह्नि और मेघविद्या को जानकर पूर्ण मनोरथवाले हूजिये ॥१५॥
Subject
अब रुद्रविषयक विद्वत्कर्त्तव्य शिक्षाविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥१५॥