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Rigveda Mandal 5 / Sukta 42 / Mantra 14

87 Sukta
18 Mantra
5/42/14
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र सु॑ष्टु॒तिः स्त॒नय॑न्तं रु॒वन्त॑मि॒ळस्पतिं॑ जरितर्नू॒नम॑श्याः। यो अ॑ब्दि॒माँ उ॑दनि॒माँ इय॑र्ति॒ प्र वि॒द्युता॒ रोद॑सी उ॒क्षमा॑णः ॥१४॥

प्र । सु॒ऽस्तु॒तिः । स्त॒नय॑न्तम् । रु॒वन्त॑म् । इ॒ळः । पति॑म् । ज॒रि॒तः॒ । नू॒नम् । अ॒श्याः॒ । यः । अ॒ब्दि॒ऽमान् । इय॑र्ति । प्र । वि॒ऽद्युता॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । उ॒क्षमा॑णः ॥

Mantra without Swara
प्र सुष्टुतिः स्तनयन्तं रुवन्तमिळस्पतिं जरितर्नूनमश्याः। यो अब्दिमाँ उदनिमाँ इयर्ति प्र विद्युता रोदसी उक्षमाणः ॥

प्र। सुऽस्तुतिः। स्तनयन्तम्। रुवन्तम्। इळः। पतिम्। जरितः। नूनम्। अश्याः। यः। अब्दिऽमान्। उदनिऽमान्। इयर्ति। प्र। विऽद्युता। रोदसी इति। उक्षमाणः ॥१४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 19 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (जरितः) स्तुति करनेवाले ! आप (यः) जो (अब्दिमान्) मेघों से युक्त और (उदनिमान्) बहुत जलवाला (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (उक्षमाणः) सींचता हुआ (विद्युता) बिजली के साथ मेघ (इयर्त्ति) प्राप्त होता है और जो (सुष्टुतिः) उत्तम प्रशंसायुक्त है उस (स्तनयन्तम्) गर्जना करते हुए को (नूनम्) निश्चय से (प्र, अश्याः) प्राप्त होओ और आप (रुवन्तम्) शब्द करते हुए (इळः) पृथिवी के (पतिम्) पालन करनेवाले की (प्र) उत्तम प्रकार जनाइये ॥१४॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो मेघ भूमि में वर्त्तमान जीवों का पालन करनेवाला, बिजुली के साथ वृष्टि करता और शब्द करता हुआ भूमि को प्राप्त होता है, उसको जान के अन्यों को जनाइये ॥१४॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥