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Rigveda Mandal 5 / Sukta 42 / Mantra 13

87 Sukta
18 Mantra
5/42/13
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र सू म॒हे सु॑शर॒णाय॑ मे॒धां गिरं॑ भरे॒ नव्य॑सीं॒ जाय॑मानाम्। य आ॑ह॒ना दु॑हि॒तुर्व॒क्षणा॑सु रू॒पा मि॑ना॒नो अकृ॑णोदि॒दं नः॑ ॥१३॥

प्र । सु । म॒हे । सु॒श॒र॒णाय॑ । मे॒धाम् । गिर॑म् । भ॒रे॒ । नव्य॑सीम् । जाय॑मानाम् । यः । आ॒ह॒नाः । दु॒हि॒तुः । व॒क्षणा॑सु । रू॒पा । मि॒ना॒नः । अकृ॑णोत् । इ॒दम् । नः॒ ॥

Mantra without Swara
प्र सू महे सुशरणाय मेधां गिरं भरे नव्यसीं जायमानाम्। य आहना दुहितुर्वक्षणासु रूपा मिनानो अकृणोदिदं नः ॥

प्र। सु। महे। सुऽशरणाय। मेधाम्। गिरम्। भरे। नव्यसीम्। जायमानाम्। यः। आहना। दुहितुः। वक्षणासु। रूपा। मिनानः। अकृणोत्। इदम्। नः ॥१३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 19 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! (यः) जो मनुष्य (वक्षणासु) बहती हुई नदियों के निमित्त (दुहितुः) कन्या के (रूपा) सुन्दर रूपों (आहनाः) और जो सब और से ताड़ित होती उनका (मिनानः) मान करता हुआ (नः) हम लोगों को (इदम्) इस वर्त्तमान सुख में पाये हुए (अकृणोत्) करे उसके साथ मैं (महे) बड़े (सुशरणाय) उत्तम आश्रय के लिये (नव्यसीम्) अत्यन्त नवीन (जायमानाम्) प्रसिद्ध (मेधाम्) उत्तम बुद्धि और (गिरम्) वाणी को (प्र, सू, भरे) उत्तम प्रकार धारण करता हूँ ॥१३॥
Essence
हे मनुष्यो ! समान रूपवाली कन्या को देखके ही उसका सदृश पति कराने के समान बुद्धि और शिक्षित वाणी को बढ़ाय के गृहाश्रम से उत्पन्न हुए सुख को सब मनुष्यों के लिये आप लोग प्राप्त कराओ ॥१३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥