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Rigveda Mandal 5 / Sukta 42 / Mantra 12

87 Sukta
18 Mantra
5/42/12
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
दमू॑नसो अ॒पसो॒ ये सु॒हस्ता॒ वृष्णः॒ पत्नी॑र्न॒द्यो॑ विभ्वत॒ष्टाः। सर॑स्वती बृहद्दि॒वोत रा॒का द॑श॒स्यन्ती॑र्वरिवस्यन्तु शु॒भ्राः ॥१२॥

दमू॑नसः । अ॒पसः॑ । ये । सु॒ऽहस्ताः॑ । वृष्णः॑ । पत्नीः॑ । न॒द्यः॑ । वि॒भ्व॒ऽत॒ष्टाः । सर॑स्वती । बृ॒ह॒त्ऽदि॒वा । उ॒त । रा॒का । द॒श॒स्यन्तीः॑ । व॒रि॒व॒स्य॒न्तु॒ । शु॒भ्राः ॥

Mantra without Swara
दमूनसो अपसो ये सुहस्ता वृष्णः पत्नीर्नद्यो विभ्वतष्टाः। सरस्वती बृहद्दिवोत राका दशस्यन्तीर्वरिवस्यन्तु शुभ्राः ॥

दमूनसः। अपसः। ये। सुऽहस्ताः। वृष्णः। पत्नीः। नद्यः। विभ्वऽतष्टाः। सरस्वती। बृहत्ऽदिवा। उत। राका। दशस्यन्तीः। वरिवस्यन्तु। शुभ्राः ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 19 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! (ये) जो (अपसः) उत्तम कर्म्म करने (दमूनसः) देने (सुहस्ताः) और उत्तम कर्म्मों में हाथ लगानेवाले (वृष्णः) पराक्रम से युक्त और (विभ्वतष्टाः) व्यापक ईश्वर से रचे गये जन (नद्यः) नदियों के सदृश (उत) और (बृहद्दिवा) बड़ा विद्या का प्रकाश जिसमें ऐसी (राका) सुख को देनेवाली (सरस्वती) विज्ञानयुक्त वाणी के सदृश (दशस्यन्तीः) अभीष्ट मनोरथ-मनोरथ को देती हुई और (शुभ्राः) सुन्दर स्वरूप तथा उत्तम आचरण करनेवाली (पत्नीः) विवाहित स्त्रियों का (वरिवस्यन्तु) सेवन करें, वे अत्यन्त सुख को प्राप्त होवें ॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। कन्या और वर जब ब्रह्मचर्य्य से विद्यायें पूर्ण, युवावस्था और परस्पर की परीक्षा होवे, तब स्वयंवर विवाह से पति और पत्नी होकर सौभाग्यवान् होते हैं ॥१२॥
Subject
अब विद्वत्कर्त्तव्यशिक्षविषय को कहते हैं ॥