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Rigveda Mandal 5 / Sukta 42 / Mantra 11

87 Sukta
18 Mantra
5/42/11
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तमु ष्टुहि यः स्वि॒षुः सु॒धन्वा॒ यो विश्व॑स्य॒ क्षय॑ति भेष॒जस्य॑। यक्ष्वा॑ म॒हे सौ॑मन॒साय॑ रु॒द्रं नमो॑भिर्दे॒वमसु॑रं दुवस्य ॥११॥

तम् । ऊँ॒ इति॑ । स्तु॒हि॒ । यः । सु॒ऽइ॒षुः । सु॒ऽधन्वा॑ । यः । विश्व॑स्य । क्षय॑ति । भे॒ष॒जस्य॑ । यक्ष्व॑ । म॒हे । सौ॒म॒न॒साय॑ । रु॒द्रम् । नमः॑ऽभिः । दे॒वम् । असु॑रम् । दु॒व॒स्य॒ ॥

Mantra without Swara
तमु ष्टुहि यः स्विषुः सुधन्वा यो विश्वस्य क्षयति भेषजस्य। यक्ष्वा महे सौमनसाय रुद्रं नमोभिर्देवमसुरं दुवस्य ॥

तम्। ऊँ इति। स्तुहि। यः। सुऽइषुः। सुऽधन्वा। यः। विश्वस्य। क्षयति। भेषजस्य। यक्ष्वा। महे। सौमनसाय। रुद्रम्। नमःऽभिः। देवम्। असुरम्। दुवस्य ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 19 Mantra » 1

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Meaning
हे राजन् अथवा विद्वान् ! (यः) जो (स्विषुः) सुन्दर वाणों से युक्त (सुधन्वा) उत्तम धनुष् वाला शत्रुओं को जीतता है और (यः) जो (विश्वस्य) सम्पूर्ण जगत् के मध्य में (भेषजस्य) ओषधि की प्रवृत्ति का (क्षयति) निवास करता वा निवास कराता है (तम्) उसकी (महे) बड़े (सौमसनाय) श्रेष्ठ मन के भाव के लिये (स्तुहि) स्तुति कीजिये और श्रेष्ठ कर्म्मों को (यक्ष्वा) मिलाइये वा प्राप्त हूजिये उस (उ) ही (देवम्) श्रेष्ठ गुणों से युक्त (रुद्रम्) और दुष्टों के रुलानेवाले (असुरम्) मेघ को बड़े श्रेष्ठ मन के भाव के लिये (नमोभिः) अन्नादिकों से (दुवस्य) सेवन कीजिये ॥११॥
Essence
हे राजन् ! जो शस्त्र और अस्त्रों के चलाने के लिये युद्धविद्या में चतुर, वैद्यविद्या में निपुण और दुष्टों के दण्ड देनेवाले जन होवें, उनकी स्तुति कर अच्छे कर्म्मों में नियुक्त कर और अच्छे प्रकार सेवन कर समस्त राजकृत्यों को पूर्ण करो ॥११॥
Subject
अब रुद्रविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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