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Rigveda Mandal 5 / Sukta 42 / Mantra 1

87 Sukta
18 Mantra
5/42/1
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्र शंत॑मा॒ वरु॑णं॒ दीधि॑ती॒ गीर्मि॒त्रं भग॒मदि॑तिं नू॒नम॑श्याः। पृष॑द्योनिः॒ पञ्च॑होता शृणो॒त्वतू॑र्तपन्था॒ असु॑रो मयो॒भुः ॥१॥

प्र । शम्ऽत॑मा । वरु॑णम् । दीधि॑ती । गीः । मि॒त्रम् । भग॑म् । अदि॑तिम् । नू॒नम् । अ॒श्याः॒ । पृष॑त्ऽयोनिः । पञ्च॑ऽहोता । शृ॒णो॒तु॒ । अतू॑र्तऽपन्थाः । असु॑रः । म॒यः॒ऽभुः ॥

Mantra without Swara
प्र शंतमा वरुणं दीधिती गीर्मित्रं भगमदितिं नूनमश्याः। पृषद्योनिः पञ्चहोता शृणोत्वतूर्तपन्था असुरो मयोभुः ॥

प्र। शम्ऽतमा। वरुणम्। दीधिती। गीः। मित्रम्। भगम्। अदितिम्। नूनम्। अश्याः। पृषत्ऽयोनिः। पञ्चऽहोता। शृणोतु। अतूर्तऽपन्थाः। असुरः। मयःऽभुः ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 17 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! जो (वरुणम्) उदान वायु को (दीधिती) प्रकाशित करती हुई (शन्तमा) अत्यन्त सुख करनेवाली (पृषद्योनिः) वृष्टि है कारण जिसका ऐसी तथा (पञ्चहोता) पाँच प्राण ग्रहण करनेवाले जिसके ऐसी (गीः) वाणी वर्त्तमान है उसको (मित्रम्) प्राण (भगम्) ऐश्वर्य और (अदितिम्) आकाश वा भूमि को (नूनम्) निश्चय करके (प्र, अश्याः) प्राप्त होवे और जो (अतूर्त्तपन्थाः) नहीं हिंसित है मार्ग जिसका ऐसा (मयोभुः) सुखकारक (असुरः) प्रकाश का आवरण करनेवाले मेघ हैं, उसमें स्थित जो वाणी उसको आप (शृणोतु) सुनिये ॥१॥
Essence
सब चर और अचर पदार्थों में आकाश के संयोग से वाणी वर्त्तमान है, उसको विद्वान् ही जान और कार्य्यों में व्यवहार में ला सकते हैं ॥१॥
Subject
अब अठारह ऋचावाले बयालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विश्वेदेवों के गुणों को कहते हैं ॥