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Rigveda Mandal 5 / Sukta 41 / Mantra 9

87 Sukta
20 Mantra
5/41/9
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
तु॒जे न॒स्तने॒ पर्व॑ताः सन्तु॒ स्वैत॑वो॒ ये वस॑वो॒ न वी॒राः। प॒नि॒त आ॒प्त्यो य॑ज॒तः सदा॑ नो॒ वर्धा॑न्नः॒ शंसं॒ नर्यो॑ अ॒भिष्टौ॑ ॥९॥

तु॒जे । नः॒ । तने॑ । पर्व॑ताः । स॒न्तु॒ । स्वऽए॑तवः । ये । वस॑वः । न । वी॒राः । प॒नि॒तः । आ॒प्त्यः । य॒ज॒तः । सदा॑ । नः॒ । वर्धा॑त् । नः॒ । शंस॑म् । नर्यः॑ । अ॒भिष्टौ॑ ॥

Mantra without Swara
तुजे नस्तने पर्वताः सन्तु स्वैतवो ये वसवो न वीराः। पनित आप्त्यो यजतः सदा नो वर्धान्नः शंसं नर्यो अभिष्टौ ॥

तुजे। नः। तने। पर्वताः। सन्तु। स्वऽएतवः। ये। वसवः। न। वीराः। पनितः। आप्त्यः। यजतः। सदा। नः। वर्धात्। नः। शंसम्। नर्यः। अभिष्टौ ॥९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 14 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! (ये) जो (स्वैतवः) उत्तम गमनवाले (वसवः) पृथिवी आदि (वीराः) बुद्धि और शरीर के बल से युक्त जनों के (न) सदृश (तने) विस्तीर्ण (तुजे) दान में (वः) हम लोगों के लिये (पर्वताः) जल के देनेवाले मेघ और दाता जनों के सदृश (सन्तु) होवें और जो (अभिष्टौ) इष्ट की सिद्धि में (पनितः) प्रशंसित (आप्त्यः) यथार्थवक्ता जनों में उत्पन्न (यजतः) मिलने वा सत्कार करने योग्य जन (नः) हम लोगों की (सदा) सदा (वर्धात्) वृद्धि करे और जो (नर्य्यः) मनुष्यों में श्रेष्ठ (नः) हम लोगों को (शंसम्) प्रशंसा को प्राप्त करावें, उन सब का हम लोग सत्कार करें ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो जन वीरजनों के सदृश शत्रुओं के निवारण करने, मेघ के सदृश देनेवाले और वायु के सदृश वेगयुक्त विद्वान् हम लोगों की नित्य वृद्धि करें, उनकी हम लोग भी वृद्धि करें ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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