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Rigveda Mandal 5 / Sukta 41 / Mantra 8

87 Sukta
20 Mantra
5/41/8
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒भि वो॑ अर्चे पो॒ष्याव॑तो॒ नॄन्वास्तो॒ष्पतिं॒ त्वष्टा॑रं॒ ररा॑णः। धन्या॑ स॒जोषा॑ धि॒षणा॒ नमो॑भि॒र्वन॒स्पतीँ॒रोष॑धी रा॒य एषे॑ ॥८॥

अ॒भि । वः॒ । अ॒र्चे॒ । पो॒ष्याऽव॑तः । नॄन् । वास्तोः॑ । पति॑म् । त्वष्टा॑रम् । ररा॑णः । धन्या॑ । स॒ऽजोषाः॑ । धि॒षणा॑ । नमः॑ऽभिः । वन॒स्पती॑न् । ओष॑धीः । रा॒यः । एषे॑ ॥

Mantra without Swara
अभि वो अर्चे पोष्यावतो नॄन्वास्तोष्पतिं त्वष्टारं रराणः। धन्या सजोषा धिषणा नमोभिर्वनस्पतीँरोषधी राय एषे ॥

अभि। वः। अर्चे। पोष्याऽवतः। नॄन्। वास्तोः। पतिम्। त्वष्टारम्। रराणः। धन्या। सऽजोषाः। धिषणा। नमःऽभिः। वनस्पतीन्। ओषधीः। रायः। एषे ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 14 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (धन्या) धन को प्राप्त हुई (सजोषाः) तुल्य प्रीति की सेवनेवाली (धिषणा) बुद्धि (नमोभिः) सत्कारों वा अन्न आदिकों से (वनस्पतीन्) अश्वत्थ आदि और (ओषधीः) यव सोमलतादिकों को तथा (रायः) धनों को (एषे) प्राप्त होने के लिये समर्थ होती है, वैसे (वास्तोः) निवास के स्थान के (पतिम्) पालनेवाले (त्वष्टारम्) तेजस्वीजन को (रराणः) दाता मैं (पोष्यावतः) बहुत पोषण करने योग्य पदार्थ जिनके विद्यमान उन (वः) आप (नॄन्) मनुष्यों का (अभि, अर्चे) प्रत्यक्ष सत्कार करता हूँ ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे तीव्र बुद्धि और विद्या से युक्त मनुष्य वैद्यक विद्या को जान कर मनुष्य आदिकों का पालन करते हैं, वैसे ही सब के हित की इच्छा करनेवाले मनुष्यों का सदा ही सत्कार करिये ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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