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Rigveda Mandal 5 / Sukta 41 / Mantra 7

87 Sukta
20 Mantra
5/41/7
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उप॑ व॒ एषे॒ वन्द्ये॑भिः शू॒षैः प्र य॒ह्वी दि॒वश्चि॒तय॑द्भिर॒र्कैः। उ॒षासा॒नक्ता॑ वि॒दुषी॑व॒ विश्व॒मा हा॑ वहतो॒ मर्त्या॑य य॒ज्ञम् ॥७॥

उप॑ । वः॒ । एषे॑ । वन्द्ये॑भिः । शू॒षैः । प्र । य॒ह्वी इति॑ । दि॒वः । चि॒तय॑त्ऽभिः । अ॒र्कैः । उ॒षसा॒नक्ता॑ । वि॒दुषी॑इ॒वेति॑ वि॒दुषी॑ऽइव । विश्व॑म् । आ । ह॒ । व॒ह॒तः॒ । मर्त्या॑य । य॒ज्ञम् ॥

Mantra without Swara
उप व एषे वन्द्येभिः शूषैः प्र यह्वी दिवश्चितयद्भिरर्कैः। उषासानक्ता विदुषीव विश्वमा हा वहतो मर्त्याय यज्ञम् ॥

उप। वः। एषे। वन्द्येभिः। शूषैः। प्र। यह्वी इति। दिवः। चितयत्ऽभिः। अर्कैः। उषासानक्ता। विदुषीऽइवेति विदुषीव। विश्वम्। आ। ह। वहतः। मर्त्याय। यज्ञम् ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 14 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (दिवः) विद्या के प्रकाशों के (चितयद्भिः) जनाते हुए (अर्कैः) सत्कार करने योग्य विद्वानों के साथ और (वन्द्येभिः) स्तुति करने योग्य (शूषैः) बलों के साथ (यह्वी) बड़ी (विदुषीव) पूर्णविद्यायुक्त स्त्री के तुल्य जो (उषसानक्ता) रात्रि और दिन (वः) आप लोगों के (उप, एषे) समीप प्राप्त होने को (मर्त्याय) मनुष्य के सुख के लिये (विश्वम्) सम्पूर्ण (यज्ञम्) विद्या के प्रचार आदि को (हा) निश्चय (प्र, आ, वहतः) सब प्रकार धारण करते हैं, उनकी सेवन की विद्या को आप लोग जानें ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे बड़ी विद्यायुक्त स्त्री सब जगह विद्यायुक्त स्त्रियों और विद्वानों में सत्कारयुक्त हो और सम्पूर्ण उत्तम गुणों को धारण करके विद्यायुक्त पति आदि की वृद्धि करती है, वैसे ही रात्रि और दिन सब व्यवहारों को धारण करके सब जगत् की वृद्धि करते हैं ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥