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Rigveda Mandal 5 / Sukta 41 / Mantra 3

87 Sukta
20 Mantra
5/41/3
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ वां॒ येष्ठा॑श्विना हु॒वध्यै॒ वात॑स्य॒ पत्म॒न्रथ्य॑स्य पु॒ष्टौ। उ॒त वा॑ दि॒वो असु॑राय॒ मन्म॒ प्रान्धां॑सीव॒ यज्य॑वे भरध्वम् ॥३॥

आ । वा॒म् । येष्ठा॑ । अ॒श्वि॒ना॒ । हु॒वध्यै॑ । वात॑स्य । पत्म॑न् । रथ्य॑स्य । पु॒ष्टौ । उ॒त । वा॒ । दि॒वः । असु॑राय । मन्म॑ । प्र । अन्धां॑सिऽइव । यज्य॑वे । भ॒र॒ध्व॒म् ॥

Mantra without Swara
आ वां येष्ठाश्विना हुवध्यै वातस्य पत्मन्रथ्यस्य पुष्टौ। उत वा दिवो असुराय मन्म प्रान्धांसीव यज्यवे भरध्वम् ॥

आ। वाम्। येष्ठा। अश्विना। हुवध्यै। वातस्य। पत्मन्। रथ्यस्य। पुष्टौ। उत। वा। दिवः। असुराय। मन्म। प्र। अन्धाँसिऽइव। यज्यवे। भरध्वम् ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 13 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (येष्ठा) अत्यन्त नियम के निर्वाहक (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक जनो ! जैसे (वाम्) आप दोनों (रथ्यस्य) रथ में उत्पन्न हुए (वातस्य) पवन के (पत्मन्) मार्ग में और (पुष्टौ) पोषण करने में (उत, वा) अथवा (असुराय) मेघ के लिये (दिवः) कामना करते हुए के (अन्धांसीव) अन्न आदिकों के सदृश (यज्यवे) यज्ञारम्भ वा यजमान के लिये कारण होते हो, वैसे (हुवध्यै) ग्रहण करने के लिये (मन्म) विज्ञान का (प्र, आ, भरध्वम्) प्रारम्भ करो ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जैसे पढ़ने और पढ़ानेवाले विद्या के प्रचार के लिये प्रयत्न करते हैं, वैसे ही सब मनुष्यों को चाहिये कि निरन्तर प्रयत्न करें ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥