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Rigveda Mandal 5 / Sukta 41 / Mantra 18

87 Sukta
20 Mantra
5/41/18
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
तां वो॑ देवाः सुम॒तिमू॒र्जय॑न्ती॒मिष॑मश्याम वसवः॒ शसा॒ गोः। सा नः॑ सु॒दानु॑र्मृ॒ळय॑न्ती दे॒वी प्रति॒ द्रव॑न्ती सुवि॒ताय॑ गम्याः ॥१८॥

ताम् । वः॒ । दे॒वाः॒ । सु॒ऽम॒तिम् । ऊ॒र्जय॑न्तीम् । इष॑म् । अ॒श्या॒म॒ । व॒स॒वः॒ । शसा॑ । गोः । सा । नः॒ । सु॒ऽदानुः॑ । मृ॒ळय॑न्ती । दे॒वी । प्रति॑ । द्रव॑न्ती । सु॒वि॒ताय॑ । ग॒म्याः॒ ॥

Mantra without Swara
तां वो देवाः सुमतिमूर्जयन्तीमिषमश्याम वसवः शसा गोः। सा नः सुदानुर्मृळयन्ती देवी प्रति द्रवन्ती सुविताय गम्याः ॥

ताम्। वः। देवाः। सुऽमतिम्। ऊर्जयन्तीम्। इषम्। अश्याम। वसवः। शसा। गोः। सा। नः। सुऽदानुः। मृळयन्ती। देवी। प्रति। द्रवन्ती। सुविताय। गम्याः ॥१८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 16 Mantra » 3

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Meaning
हे (देवाः) धार्मिक विद्वान् जनो ! जो (सुदानुः) उत्तम दान से युक्त (मृळयन्ती) सुख देती (प्रति द्रवन्ती) जानती वा चलती हुई (देवी) विद्यायुक्त स्त्री (सुविताय) ऐश्वर्य्य के लिये (वः) आप लोगों को प्राप्त होती है (ताम्) उसको (ऊर्जयन्तीम्) तथा पराक्रम आदि के दान से वृद्धि कराती हुई (सुमतिम्) श्रेष्ठ बुद्धि को और (इषम्) अन्न को हम लोग (अश्याम) भोगें। हे (वसवः) उत्तम गुणों में निवास किये हुए जनो ! जो (गोः) पृथिवी के मध्य में (शसा) प्रशंसा के साथ वर्त्तमान है (सा) वह (नः) हम लोगों को प्राप्त हो। और हे विद्यायुक्त स्त्री ! आप इन जनों के (प्रति) प्रति (गम्याः) प्राप्त हूजिये ॥१८॥
Essence
मनुष्य सदा उत्तम प्रकार घृत आदि के संस्कार से युक्त बुद्धि और बल के बढानेवाले अन्न का सदा भोग करें, जिससे बुद्धि यश और धन बढ़े ॥१८॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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