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Rigveda Mandal 5 / Sukta 41 / Mantra 17

87 Sukta
20 Mantra
5/41/17
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इति॑ चि॒न्नु प्र॒जायै॑ पशु॒मत्यै॒ देवा॑सो॒ वन॑ते॒ मर्त्यो॑ व॒ आदे॑वासो वनते॒ मर्त्यो॑ वः। अत्रा॑ शि॒वां त॒न्वो॑ धा॒सिम॒स्या ज॒रां चि॑न्मे॒ निर्ऋ॑तिर्जग्रसीत ॥१७॥

इति॑ । चि॒त् । नु । प्र॒ऽजायै॑ । प॒शु॒ऽमत्यै॑ । देवा॑सः । वन॑ते । मर्त्यः॑ । वः॒ । आ । दे॒वा॒सः॒ । व॒न॒ते॒ । मर्त्यः॑ । वः॒ । अत्र॑ । शि॒वाम् । त॒न्वः॑ । धा॒सिम् । अ॒स्याः । ज॒राम् । चि॒त् । मे॒ । निःऽऋ॑तिः । ज॒ग्र॒सी॒त॒ ॥

Mantra without Swara
इति चिन्नु प्रजायै पशुमत्यै देवासो वनते मर्त्यो व आदेवासो वनते मर्त्यो वः। अत्रा शिवां तन्वो धासिमस्या जरां चिन्मे निर्ऋतिर्जग्रसीत ॥

इति। चित्। नु। प्रऽजायै। पशुऽमत्यै। देवासः। वनते। मर्त्यः। वः। आ। देवासः। वनते। मर्त्यः। वः। अत्र। शिवाम्। तन्वः। धासिम्। अस्याः। जराम्। चित्। मे। निःऽऋतिः। जग्रसीत ॥१७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 16 Mantra » 2

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Meaning
हे (देवासः) विद्वान् जनो ! जो (मर्त्यः) मनुष्य (वः) आप लोगों को (पशुमत्यै) बहुत पशु विद्यमान जिसमें उस (प्रजायै) प्रजा के लिये (धासिम्) अन्न की (वनते) सेवा करता है और जो (चित्) निश्चय से (इति) इस प्रकार से (अस्याः) इस प्रजा के (तन्वः) शरीर की (शिवाम्) मङ्गलस्वरूप (जराम्) वृद्धावस्था की (आ, वनते) अच्छे प्रकार सेवा करता है और जो (मर्त्यः) मनुष्य (चित्) निश्चय से (मे) मेरे शरीर की मङ्गलस्वरूप वृद्धावस्था का सेवन करता है और (निर्ऋतिः) भूमि के सदृश (अत्रा) इस प्रजा में (वः) आप लोगों के अन्न को (जग्रसीत) खाता है, इस प्रकार हे (देवासः) विद्वान् ! आप लोग हम लोगों के लिये इसको (नु) शीघ्र सिद्ध कीजिये ॥१७॥
Essence
हे विद्वान् जनो ! आप लोग ऐसा प्रयत्न करो जिससे मनुष्यों की अवस्था बढ़े, जब तक मनुष्य वृद्ध नहीं होते, तब तक ये परीक्षक भी नहीं होते हैं ॥१७॥
Subject
फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ॥

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