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Rigveda Mandal 5 / Sukta 41 / Mantra 15

87 Sukta
20 Mantra
5/41/15
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प॒देप॑दे मे जरि॒मा नि धा॑यि॒ वरू॑त्री वा श॒क्रा या पा॒युभि॑श्च। सिष॑क्तु मा॒ता म॒ही र॒सा नः॒ स्मत्सू॒रिभि॑र्ऋजु॒हस्त॑ ऋजु॒वनिः॑ ॥१५॥

प॒देऽप॑दे । मे॒ । ज॒रि॒मा । नि । धा॒यि॒ । वरू॑त्री । वा॒ । श॒क्रा । या । पा॒युऽभिः॑ । च॒ । सिस॑क्तु । मा॒ता । म॒ही । र॒सा । नः॒ । स्मत् । सू॒रिऽभिः॑ । ऋ॒जु॒ऽहस्ता॑ । ऋ॒जु॒ऽवनिः॑ ॥

Mantra without Swara
पदेपदे मे जरिमा नि धायि वरूत्री वा शक्रा या पायुभिश्च। सिषक्तु माता मही रसा नः स्मत्सूरिभिर्ऋजुहस्त ऋजुवनिः ॥

पदेऽपदे। मे। जरिमा। नि। धायि। वरूत्री। वा। शक्रा। या। पायुऽभिः। च। सिसक्तु। माता। मही। रसा। नः। स्मत्। सूरिऽभिः। ऋजुऽहस्ता। ऋजुऽवनिः ॥१५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 15 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (सूरिभिः) विद्वानों और (पायुभिः) रक्षकों से (च) और (या) जो (मे) मेरे (पदेपदे) प्राप्त होने प्राप्त होने, जानने जानने वा जाने जाने योग्य पदार्थ में (वरूत्री) श्रेष्ठ सुख की देने (जरिमा) और स्तुति करानेवाली (वा) वा (शक्रा) सामर्थ्य में कारण (माता) माता (रस) रस आदि गुणों से युक्त (मही) बड़ी वाणी वा भूमि (ऋजुहस्ता) ऋजु अर्थात् सरल हस्त जिसके वा जिसमें वह (ऋजुवनिः) ऋजु अर्थात् नहीं जो कुटिल उन पदार्थों के विभक्त करनेवाली (नः) हम लोगों को (सिषक्तु) सम्बन्धित करे वह (स्मत्) ही (नि) निरन्तर (धायि) स्थित की जाती है ॥१५॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे माता सन्तानों की रक्षा करती है, वैसे ही विद्वानों के संग से प्राप्त और उत्तम प्रकार शिक्षित विद्या विद्वानों की सब प्रकार रक्षा करती है ॥१५॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥