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Rigveda Mandal 5 / Sukta 41 / Mantra 11

87 Sukta
20 Mantra
5/41/11
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
क॒था म॒हे रु॒द्रिया॑य ब्रवाम॒ कद्रा॒ये चि॑कि॒तुषे॒ भगा॑य। आप॒ ओष॑धीरु॒त नो॑ऽवन्तु॒ द्यौर्वना॑ गि॒रयो॑ वृ॒क्षके॑शाः ॥११॥

क॒था । म॒हे । रु॒द्रिया॑य । ब्र॒वा॒म॒ । कत् । रा॒ये । चि॒कि॒तुषे॑ । भगा॑य । आपः॑ । ओष॑धीः । उ॒त । नः॒ । अ॒व॒न्तु॒ । द्यौः । वना॑ । गि॒रयः॑ । वृ॒क्षऽके॑शाः ॥

Mantra without Swara
कथा महे रुद्रियाय ब्रवाम कद्राये चिकितुषे भगाय। आप ओषधीरुत नोऽवन्तु द्यौर्वना गिरयो वृक्षकेशाः ॥

कथा। महे। रुद्रियाय। ब्रवाम। कत्। राये। चिकितुषे। भगाय। आपः। ओषधीः। उत। नः। अवन्तु। द्यौः। वना। गिरयः। वृक्षऽकेशाः ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 15 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जनो ! मनुष्य (आपः) जल (ओषधीः) सोमलता आदि ओषधियाँ (वृक्षकेशाः) वृक्ष हैं केशों के समान जिनके वे पर्वत (गिरयः) मेघ (उत) और (द्यौः) सूर्य्य (वना) किरणों के सदृश (नः) हम लोगों की (अवन्तु) रक्षा करें, उनके सहाय से हम लोग (महे) बड़े (चिकितुषे) जानने योग्य और (रुद्रियाय) रुलानेवाले से प्राप्त हुए के लिये (कथा) किस प्रकार से (ब्रवाम) उपदेश देवें और (राये) धन और (भगाय) ऐश्वर्य्य के लिये (कत्) कब उपदेश देवें ॥११॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । सब मनुष्य अपने और अन्यों के रक्षण के लिये विद्वानों को मिल के प्रश्न और उत्तर से सत्य विद्याओं को प्राप्त हो और अन्यों के लिये उपदेश देकर ऐश्वर्य्य की वृद्धि कब करें, इस प्रकार नित्य उत्साह करें ॥११॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥