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Rigveda Mandal 5 / Sukta 41 / Mantra 10

87 Sukta
20 Mantra
5/41/10
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वृष्णो॑ अस्तोषि भू॒म्यस्य॒ गर्भं॑ त्रि॒तो नपा॑तम॒पां सु॑वृ॒क्ति। गृ॒णी॒ते अ॒ग्निरे॒तरी॒ न शू॒षैः शो॒चिष्के॑शो॒ नि रि॑णाति॒ वना॑ ॥१०॥

वृष्णः॑ । अ॒स्तो॒षि॒ । भू॒म्यस्य॑ । गर्भ॑म् । त्रि॒तः । नपा॑तम् । अ॒पाम् । सु॒ऽवृ॒क्ति । गृ॒णी॒ते । अ॒ग्निः । ए॒तरि॑ । न । शू॒षैः । शो॒चिःऽके॑शः । नि । रि॒णा॒ति॒ । वना॑ ॥

Mantra without Swara
वृष्णो अस्तोषि भूम्यस्य गर्भं त्रितो नपातमपां सुवृक्ति। गृणीते अग्निरेतरी न शूषैः शोचिष्केशो नि रिणाति वना ॥

वृष्णः। अस्तोषि। भूम्यस्य। गर्भम्। त्रितः। नपातम्। अपाम्। सुऽवृक्ति। गृणीते। अग्निः। एतरि। न। शूषैः। शोचिःऽकेशः। नि। रिणाति। वना ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 14 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! आप (वृष्णः) सुख की वृष्टि करनेवालों की (अस्तोषि) प्रशंसा करते हो (त्रितः) तीनों में वृद्धिकरनेवाला (अपाम्) मनुष्यों के सदृश प्राणियों के (नपातम्) नहीं पतन जिसका उस (भूम्यस्य) पृथ्वी में हुए (गर्भम्) गर्भ की (सुवृक्ति) उत्तम गमन के सहित (गृणीते) स्तुति करता है, इस प्रकार जो (अग्निः) पवित्र करनेवाले अग्नि के (एतरी) प्राप्त होती हुई के और (शोचिष्केशः) प्रकाशित विज्ञानवाले के (न) सदृश (शूषैः) बलों से (वना) किरणों को (नि, रिणाति) जाता वा प्राप्त होता है, वही सम्पूर्ण सृष्टि में उत्पन्न हुए सुख को प्राप्त होता है ॥१०॥
Essence
वही पुरुष बहुत धन और आदर को प्राप्त होता है कि जो सृष्टिक्रम की विद्या को जान कर कार्य्य की सिद्धि के लिये यत्न करता है ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥