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Rigveda Mandal 5 / Sukta 40 / Mantra 4

87 Sukta
9 Mantra
5/40/4
Devata- इन्द्र: Rishi- अत्रिः Chhanda- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
ऋ॒जी॒षी व॒ज्री वृ॑ष॒भस्तु॑रा॒षाट्छु॒ष्मी राजा॑ वृत्र॒हा सो॑म॒पावा॑। यु॒क्त्वा हरि॑भ्या॒मुप॑ यासद॒र्वाङ्माध्यं॑दिने॒ सव॑ने मत्स॒दिन्द्रः॑ ॥४॥

ऋ॒जी॒षी । व॒ज्री । वृ॒ष॒भः । तु॒रा॒षाट् । शु॒ष्मी । राजा॑ । वृ॒त्र॒ऽहा । स॒म॒ऽपावा॑ । यु॒क्त्वा । हरि॑ऽभ्याम् । उप॑ । या॒स॒त् । अ॒र्वाङ् । माध्य॑न्दिने । सव॑ने । म॒त्स॒त् । इन्द्रः॑ ॥

Mantra without Swara
ऋजीषी वज्री वृषभस्तुराषाट्छुष्मी राजा वृत्रहा सोमपावा। युक्त्वा हरिभ्यामुप यासदर्वाङ्माध्यंदिने सवने मत्सदिन्द्रः ॥

ऋजीषी। वज्री। वृषभः। तुराषाट्। शुष्मी। राजा। वृत्रऽहा। सोमऽपावा। युक्त्वा। हरिऽभ्याम्। उप। यासत्। अर्वाङ्। माध्यंदिने। सवने। मत्सत्। इन्द्रः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 11 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (ऋजीषी) सरल आदि से युक्त (वज्री) शस्त्र और अस्त्रों का धारण करनेवाला (वृषभः) बलिष्ठ (शुष्मी) बलिष्ठ सेना से युक्त (तुराषाट्) हिंसा करनेवाले शत्रुओं को सहने (सोमपावा) श्रेष्ठ ओषधियों के रस को पीने (वृत्रहा) दुष्ट शत्रुओं के नाश करने और (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य्य का करनेवाला (राजा) विद्या और विनय से प्रकाशमान (हरिभ्याम्) घोड़ों से वाहन को (युक्त्वा) युक्त करके (अर्वाङ्) पीछे (उप, यासत्) समीप प्राप्त होवे और (माध्यन्दिने) मध्याह्न में (सवने) भोजन के समय (मत्सत्) आनन्दित होवे, उसी को अधिष्ठाता करो ॥४॥
Essence
वही राजा प्रशंसित होवे, जो राज्य के अङ्गों और विद्याओं को ग्रहण करके प्रजापालन के लिये प्रयत्न करे ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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