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Rigveda Mandal 5 / Sukta 40 / Mantra 3

87 Sukta
9 Mantra
5/40/3
Devata- इन्द्र: Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृदुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
वृषा॑ त्वा॒ वृष॑णं हुवे॒ वज्रि॑ञ्चि॒त्राभि॑रू॒तिभिः॑। वृष॑न्निन्द्र॒ वृष॑भिर्वृत्रहन्तम ॥३॥

वृषा॑ । त्वा॒ । वृष॑णम् । हु॒वे॒ । वज्रि॑न् । चि॒त्राभिः॑ । ऊ॒तिऽभिः॑ । वृष॑न् । इ॒न्द्र॒ । वृष॑ऽभिः । वृ॒त्र॒ह॒न्ऽत॒म॒ ॥

Mantra without Swara
वृषा त्वा वृषणं हुवे वज्रिञ्चित्राभिरूतिभिः। वृषन्निन्द्र वृषभिर्वृत्रहन्तम ॥

वृषा। त्वा। वृषणम्। हुवे। वज्रिन्। चित्राभिः। ऊतिऽभिः। वृषन्। इन्द्र। वृषऽभिः। वृत्रहन्ऽतम ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 11 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वृषन्) सुख करनेवाले (वज्रिन्) बहुत शस्त्र और अस्त्रों से युक्त (वृत्रहन्तम) अत्यन्त दुष्टों के नाश करनेवाले (इन्द्र) ऐश्वर्य्य की इच्छा करनेवाले ! (वृषा) वृष्टि करनेवाला मैं (चित्राभिः) अद्भुत (ऊतिभिः) रक्षादि क्रियाओं और (वृषभिः) दुष्टों के सामर्थ्य को बाँधनेवालों के साथ वर्त्तमान (वृषणम्) बलिष्ठ (त्वा) आप को (हुवे) बुलाता हूँ ॥३॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि सूर्य्य के सदृश वर्त्तमान और सब प्रकार गुणों से सम्पन्न बलिष्ठ, न्यायकारी राजा को स्वीकार करें, जिससे सब प्रकार से रक्षा होवे ॥३॥
Subject
फिर इन्द्रपदवाच्य राजा के गुणों को कहते हैं ॥