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Rigveda Mandal 5 / Sukta 40 / Mantra 1

87 Sukta
9 Mantra
5/40/1
Devata- इन्द्र: Rishi- अत्रिः Chhanda- स्वराडुष्निक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
आ या॒ह्यद्रि॑भिः सु॒तं सोमं॑ सोमपते पिब। वृष॑न्निन्द्र॒ वृष॑भिर्वृत्रहन्तम ॥१॥

आ । या॒हि॒ । अद्रि॑ऽभिः । सु॒तम् । सोम॑म् । सो॒म॒ऽप॒ते॒ । पि॒ब॒ । वृष॑न् । इ॒न्द्र॒ । वृष॑ऽभिः । वृ॒त्र॒ह॒न्ऽत॒म॒ ॥

Mantra without Swara
आ याह्यद्रिभिः सुतं सोमं सोमपते पिब। वृषन्निन्द्र वृषभिर्वृत्रहन्तम ॥

आ। याहि। अद्रिऽभिः। सुतम्। सोमम्। सोमऽपते। पिब। वृषन्। इन्द्र। वृषऽभिः। वृत्रहन्ऽतम ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 11 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सोमपते) ऐश्वर्य्य के स्वामिन् ! (वृषन्) बैल के सदृश आचरण करते हुए (वृत्रहन्तम) अत्यन्त धन को प्राप्त होने और (इन्द्र) ऐश्वर्य की इच्छा करनेवाले जन ! (वृषभिः) बलिष्ठों के साथ आप (अद्रिभिः) मेघों से (सुतम्) उत्पन्न हुए (सोमम्) सोमलता आदि ओषधियों के रस को (पिब) पान करिये और सङ्ग्राम को (आ, याहि) प्राप्त हूजिये ॥१॥
Essence
जो ऐश्वर्य्य की इच्छा करें, वे अवश्य बल और बुद्धि की वृद्धि करें ॥१॥
Subject
अब नव ऋचावाले चालीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्र के गुणों को कहते हैं ॥१॥