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Rigveda Mandal 5 / Sukta 4 / Mantra 9

87 Sukta
11 Mantra
5/4/9
Devata- अग्निः Rishi- वसुश्रुत आत्रेयः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
विश्वा॑नि नो दु॒र्गहा॑ जातवेदः॒ सिन्धुं॒ न ना॒वा दु॑रि॒ताति॑ पर्षि। अग्ने॑ अत्रि॒वन्नम॑सा गृणा॒नो॒३॒॑स्माकं॑ बोध्यवि॒ता त॒नूना॑म् ॥९॥

विश्वा॑नि । नः॒ । दुः॒ऽगहा॑ । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ । सिन्धु॑म् । न । ना॒वा । दुः॒ऽइ॒ता । अति॑ । प॒र्षि॒ । अग्ने॑ । अ॒त्रि॒ऽवत् । नम॑सा । गृ॒णा॒नः । अ॒स्माक॑म् । बो॒धि॒ । अ॒वि॒ता । त॒नूना॑म् ॥

Mantra without Swara
विश्वानि नो दुर्गहा जातवेदः सिन्धुं न नावा दुरिताति पर्षि। अग्ने अत्रिवन्नमसा गृणानो३स्माकं बोध्यविता तनूनाम् ॥

विश्वानि। नः। दुःऽगहा। जातवेदः। सिन्धुम्। न। नावा। दुःऽइता। अति। पर्षि। अग्ने। अत्रिऽवत्। नमसा। गृणानः। अस्माकम्। बोधि। अविता। तनूनाम् ॥९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 19 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अत्रिवत्) निरन्तर चलनेवालों से युक्त (जातवेदः) विद्याओं से सम्पन्न (अग्ने) धर्मिष्ठ राजन् ! जिससे आप (नावा) नौका से (सिन्धुम्) नदी वा समुद्र को (न) जैसे वैसे (नः) हम लोगों के (विश्वानि) समस्त (दुर्गहा) दुःख से पार जाने को योग्य और (दुरिता) दुःख से प्राप्त होने योग्यों के भी (अति, पर्षि) पार जाते हो (नमसा) सत्कार वा अन्न आदि से (गृणानः) स्तुति करते हुए (अस्माकम्) हम लोगों के (तनूनाम्) शरीरों के (अविता) रक्षक होते हुए (बोधि) जानते हो, इससे निरन्तर सेवा करने योग्य हो ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा अध्यापक और उपदेशक जन सब लोगों को दुःख से पार पहुँचाते हैं, वे अतुल सुख को प्राप्त होते हैं ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥