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Rigveda Mandal 5 / Sukta 4 / Mantra 2

87 Sukta
11 Mantra
5/4/2
Devata- अग्निः Rishi- वसुश्रुत आत्रेयः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ह॒व्य॒वाळ॒ग्निर॒जरः॑ पि॒ता नो॑ वि॒भुर्वि॒भावा॑ सु॒दृशी॑को अ॒स्मे। सु॒गा॒र्ह॒प॒त्याः समिषो॑ दिदीह्यस्म॒द्र्य१॒॑क्सं मि॑मीहि॒ श्रवां॑सि ॥२॥

ह॒व्य॒ऽवाट् । अ॒ग्निः । अ॒जरः॑ । पि॒ता । नः॒ । वि॒ऽभुः । वि॒भाऽवा॑ । सु॒ऽदृशी॑कः । अ॒स्मे इति॑ । सु॒ऽगा॒र्ह॒प॒त्याः । सम् । इषः॑ । दि॒दी॒हि॒ । अ॒स्म॒द्र्य॑क् । सम् । मि॒मी॒हि॒ । श्रवां॑सि ॥

Mantra without Swara
हव्यवाळग्निरजरः पिता नो विभुर्विभावा सुदृशीको अस्मे। सुगार्हपत्याः समिषो दिदीह्यस्मद्र्य१क्सं मिमीहि श्रवांसि ॥

हव्यऽवाट्। अग्निः। अजरः। पिता। नः। विऽभुः। विभाऽवा। सुऽदृशीकः। अस्मे इति। सुऽगार्हपत्याः। सम्। इषः। दिदीहि। अस्मद्र्यक्। सम्। मिमीहि। श्रवांसि ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 18 Mantra » 2

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Meaning
हे राजन् जैसे (हव्यवाट्) द्रव्यों को एक स्थान से दूसरे स्थान में पहुँचाने वा (सुदृशीकः) उत्तम प्रकार देखने वा दिखानेवाला (अग्निः) शुद्धस्वरूप अग्नि जैसे (विभुः) व्यापक परमेश्वर के सदृश सब का पालन करता और प्रकाशित होता है, वैसे (विभावा) अनेक प्रकार के प्रकाश वा ज्ञान से युक्त (अजरः) वृद्धावस्थारहित (नः) हम लोगों के (पिता) पालन करनेवाले होते हुए (अस्मे) हम लोगों के लिये (सुगार्हपत्याः) सुन्दर अग्नि आदि पदार्थ समुदायवाले (इषः) अन्नों को (सम्, दिदीहि) अच्छे प्रकार दीजिये और (अस्मद्र्यक्) हम लोगों का आदर करने, जानने वा जनानेवाले होते हुए (श्रवांसि) पढ़ने और पढ़ाने आदि कर्म्मों का (सम्, मिमीहि) विधान करिये ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे राजन् ! जैसे बिजुली और भूमि में प्रसिद्ध हुए रूप से अग्नि सब का उपकार करता है और जैसे परमेश्वर असंख्यात पदार्थों के उत्पन्न करने से पितरों के सदृश सब का पालन करता है, वैसे ही आप हूजिये ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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