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Rigveda Mandal 5 / Sukta 39 / Mantra 2

87 Sukta
5 Mantra
5/39/2
Devata- इन्द्र: Rishi- अत्रिः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यन्मन्य॑से॒ वरे॑ण्य॒मिन्द्र॑ द्यु॒क्षं तदा भ॑र। वि॒द्याम॒ तस्य॑ ते व॒यमकू॑पारस्य दा॒वने॑ ॥२॥

यत् । मन्य॑से । वरे॑ण्यम् । इन्द्र॑ । द्यु॒क्षम् । तत् । आ । भ॒र॒ । वि॒द्याम॑ । तस्य॑ । ते॒ । व॒यम् । अकू॑पारस्य । दा॒वने॑ ॥

Mantra without Swara
यन्मन्यसे वरेण्यमिन्द्र द्युक्षं तदा भर। विद्याम तस्य ते वयमकूपारस्य दावने ॥

यत्। मन्यसे। वरेण्यम्। इन्द्र। द्युक्षम्। तत्। आ। भर। विद्याम। तस्य। ते। वयम्। अकूपारस्य। दावने ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 10 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त ! आप (यत्) जिस (वरेण्यम्) स्वीकार करने योग्य (द्युक्षम्) धर्म्म और विद्या के प्रकाश से युक्त को (मन्यसे) मानते हो (तत्) उसको हम लोगों के लिये (आ, भर) धारण कीजिये जिससे (अकूपारस्य) श्रेष्ठ है पार जिनका (तस्य) उन (ते) आपके (दावने) दाता के लिये (वयम्) हम लोग प्रयत्न को (विद्याम) जानें ॥२॥
Essence
हे विद्वन् ! आप जिस-जिस उत्तम विषय को जानते हैं, उसका हम लोगों के प्रति उपदेश कीजिये, जिससे हम लोग आपके राजकार्य्य को पूर्णरूप से करने को समर्थ होवें ॥२॥
Subject
अब विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥