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Rigveda Mandal 5 / Sukta 38 / Mantra 2

87 Sukta
5 Mantra
5/38/2
Devata- इन्द्र: Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यदी॑मिन्द्र श्र॒वाय्य॒मिषं॑ शविष्ठ दधि॒षे। प॒प्र॒थे दी॑र्घ॒श्रुत्त॑मं॒ हिर॑ण्यवर्ण दु॒ष्टर॑म् ॥२॥

यत् । ई॒म् । इ॒न्द्र॒ । श्र॒वाय्य॑म् । इष॑म् । श॒वि॒ष्ठ॒ । द॒धि॒षे । प॒प्र॒थे । दी॒र्घ॒श्रुत्ऽत॑मम् । हिर॑ण्यऽवर्ण । दु॒स्तर॑म् ॥

Mantra without Swara
यदीमिन्द्र श्रवाय्यमिषं शविष्ठ दधिषे। पप्रथे दीर्घश्रुत्तमं हिरण्यवर्ण दुष्टरम् ॥

यत्। ईम्। इन्द्र। श्रवाय्यम्। इषम्। शविष्ठ। दधिषे। पप्रथे। दीर्घश्रुत्ऽतमम्। हिरण्यऽवर्ण। दुस्तरम् ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 9 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शविष्ठ) अतिबलयुक्त और (हिरण्यवर्ण) सुवर्ण को स्वीकार करनेवाले (इन्द्र) दुःख के नाश करनेवाले ! (यत्) जो (श्रवाय्यम्) सुनने के योग्य और (दुष्टरम्) दुःख से तरने योग्य (इषम्) अन्न आदि को (पप्रथे) प्रकट करता है उस (ईम्) प्राप्त होने योग्य और दुःख से तरने योग्य (दीर्घश्रुत्तमम्) अतिकाल से अधिकतर सुननेवाले को आप (दधिषे) धारण करते हो ॥२॥
Essence
हे राजन् ! जो पूर्णविद्या से युक्त, धन-धान्य, पशु और प्रजाओं का बढ़ाने और ब्रह्मचर्य्य से बड़ा पराक्रमवाला है, उसी को राजकर्म्मचारी कीजिये ॥२॥
Subject
अब विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥