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Rigveda Mandal 5 / Sukta 38 / Mantra 1

87 Sukta
5 Mantra
5/38/1
Devata- इन्द्र: Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒रोष्ट॑ इन्द्र॒ राध॑सो वि॒भ्वी रा॒तिः श॑तक्रतो। अधा॑ नो विश्वचर्षणे द्यु॒म्ना सु॑क्षत्र मंहय ॥१॥

उ॒रोः । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । राध॑सः । वि॒ऽभ्वी । रा॒तिः । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो । अध॑ । नः॒ । वि॒श्व॒ऽच॒र्ष॒णे॒ । द्यु॒म्ना । सु॒ऽक्ष॒त्र॒ । मं॒ह॒य॒ ॥

Mantra without Swara
उरोष्ट इन्द्र राधसो विभ्वी रातिः शतक्रतो। अधा नो विश्वचर्षणे द्युम्ना सुक्षत्र मंहय ॥

उरोः। ते। इन्द्र। राधसः। विऽभ्वी। रातिः। शतक्रतो इति शतऽक्रतो। अध। नः। विश्वऽचर्षणे। द्युम्ना। सुऽक्षत्र। मंहय ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 9 Mantra » 1

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Meaning
हे (विश्वचर्षणे) सम्पूर्ण देखने योग्य पदार्थों के देखनेवाले (शतक्रतो) अनन्त बुद्धि से युक्त और (सुक्षत्र) सुन्दर क्षत्र वा द्रव्यवाले (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त ! जिन (ते) आपके (उरोः) बहुत (राधसः) धन का (विभ्वी) व्याप्त होनेवाला (रातिः) दान है (अधा) इसके अनन्तर न्याय से प्रजाओं का पालन करते हो वह आप (नः) हम लोगों को (द्युम्ना) यश वा धन से (मंहय) बड़े करिये ॥१॥
Essence
जो पूर्णविद्या से युक्त, असंख्य धन देने और सम्पूर्ण व्यवहारों को जाननेवाला, अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त उत्तम स्वभाव और नम्रता से युक्त होवे, वह राजा प्रजाओं के पालन करने को समर्थ होवे ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले अड़तीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्र के गुणों को कहते हैं ॥

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