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Rigveda Mandal 5 / Sukta 37 / Mantra 2

87 Sukta
5 Mantra
5/37/2
Devata- इन्द्र: Rishi- प्रभूवसुराङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
समि॑द्धाग्निर्वनवत्स्ती॒र्णब॑र्हिर्यु॒क्तग्रा॑वा सु॒तसो॑मो जराते। ग्रावा॑णो॒ यस्ये॑षि॒रं वद॒न्त्यय॑दध्व॒र्युर्ह॒विषाव॒ सिन्धु॑म् ॥२॥

समि॑द्धऽअग्निः । व॒न॒व॒त् । स्ती॒र्णऽब॑र्हिः । यु॒क्तऽग्रा॑वा । सु॒तऽसो॑मः । ज॒रा॒ते॒ । ग्रावा॑णः । यस्य॑ । इ॒षि॒रम् । वद॑न्ति । अय॑त् । अ॒ध्व॒र्युः । ह॒विषा॑ । अव॑ । सिन्धु॑म् ॥

Mantra without Swara
समिद्धाग्निर्वनवत्स्तीर्णबर्हिर्युक्तग्रावा सुतसोमो जराते। ग्रावाणो यस्येषिरं वदन्त्ययदध्वर्युर्हविषाव सिन्धुम् ॥

समिद्धऽअग्निः। वनवत्। स्तीर्णऽबर्हिः। युक्तऽग्रावा। सुतऽसोमः। जराते। ग्रावाणः। यस्य। इषिरम्। वदन्ति। अयत्। अध्वर्युः। हविषा। अव। सिन्धुम् ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 8 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! जो (स्तीर्णबर्हिः) अर्थात् आच्छादित किया अन्तरिक्ष जिसने ऐसा और (युक्तग्रावा) युक्त मेघ जिससे (सुतसोमः) तथा प्रकट हुआ चन्द्रमा जिससे (समिद्धाग्निः) वह प्रदीप्त हुआ अग्नि सम्पूर्ण पदार्थों का (वनवत्) सम्भोग करता है (यस्य) जिसके (इषिरम्) गमन को (ग्रावाणः) मेघ (वदन्ति) शब्द से सूचित करते हैं, जिसको (अध्वर्युः) शिल्पविद्या की कामना करता हुआ जन (हविषा) अग्नि में छोड़ने योग्य सामग्री से (सिन्धुम्) समुद्र को (अव, अयत्) प्राप्त होता और (जराते) स्तुति करता है, उस अग्नि का कार्य्यों में संप्रयोग करो ॥२॥
Essence
हे विद्वानो ! जो अग्नि सम्पूर्ण पदार्थों में व्याप्त और बहुत उत्तम गुण और क्रियावान् है, उसको जानकर कार्य्यों को सिद्ध करो ॥२॥
Subject
अब शिल्पी विद्वान् के विषय को कहते हैं ॥