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Rigveda Mandal 5 / Sukta 36 / Mantra 6

87 Sukta
6 Mantra
5/36/6
Devata- इन्द्र: Rishi- प्रभूवसुराङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यो रोहि॑तौ वा॒जिनौ॑ वा॒जिनी॑वान्त्रि॒भिः श॒तैः सच॑मना॒वदि॑ष्ट। यूने॒ सम॑स्मै क्षि॒तयो॑ नमन्तां श्रु॒तर॑थाय मरुतो दुवो॒या ॥६॥

यः । रोहि॑तौ । वा॒जिनौ॑ । वा॒जिनी॑ऽवान् । त्रि॒ऽभिः । श॒तैः । सच॑मानौ । अदि॑ष्ट । यूने॑ । सम् । अ॒स्मै॒ । क्षि॒तयः॑ । न॒म॒न्ता॒म् । श्रु॒तऽर॑थाय । म॒रु॒तः॒ । दु॒वः॒ऽया ॥

Mantra without Swara
यो रोहितौ वाजिनौ वाजिनीवान्त्रिभिः शतैः सचमनावदिष्ट। यूने समस्मै क्षितयो नमन्तां श्रुतरथाय मरुतो दुवोया ॥

यः। रोहितौ। वाजिनौ। वाजिनीऽवान्। त्रिऽभिः। शतैः। सचमानौ। अदिष्ट। यूने। सम्। अस्मै। क्षितयः। नमन्ताम्। श्रुतऽरथाय। मरुतः। दुवःऽया ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 7 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुतः) मनुष्यो ! (यः) जो (वाजिनीवान्) वेग की क्रिया का जाननेवाला (त्रिभिः) तीन (शतैः) सैकड़ों से (अस्मै) इस (यूने) युवा पुरुष के लिये (सचमानौ) मिले हुए (दुवोया) जो परिचरण को प्राप्त होते हैं उन (वाजिनौ) बड़े वेगवाले (रोहितौ) बिजुली और प्रसिद्ध अग्नि का (अदिष्ट) उपदेश देवे उस (श्रुतरथाय) सुने गये वाहन जिसके उसके लिये (क्षितयः) मनुष्य (सम्, नमन्ताम्) अच्छे प्रकार नम्र होवें ॥६॥
Essence
जो विमान आदि वाहन के कार्य्यों में अग्नि आदि पदार्थों का संप्रयोग करते हैं, वे जितने तीन सौ घोड़ों से वाहन शीघ्र पहुँचाते हैं, उतना बल उस कला में होता है और जो इस प्रकार शिल्पविद्या के कृत्यों में प्रसिद्ध होते हैं, उनका सत्कार सब करते हैं ॥६॥ इस सूक्त में इन्द्र विद्वान् और शिल्पी के कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह छत्तीसवाँ सूक्त और सप्तम वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
अब शिल्पिकार्य्यविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥